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दिशा फिर चल पड़ी है…

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  कुछ नए शब्दों के साथ, कुछ पुराने एहसासों के साथ कभी-कभी जीवन की व्यस्तताएँ हमें उस रास्ते से थोड़ा दूर ले जाती हैं, जिस पर चलना हमें सबसे अधिक प्रिय होता है। जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है और मन के किसी कोने में हमारी कुछ इच्छाएँ चुपचाप प्रतीक्षा करती रहती हैं। मेरे लिए लेखन भी ऐसी ही एक आत्मीय यात्रा है। शब्दों से मेरा रिश्ता केवल कागज़ पर भावनाएँ उतारने तक सीमित नहीं रहा। कभी कविता बनकर शब्दों ने मन की बात कही, कभी किसी रचना में समाज के प्रति मेरी संवेदनाएँ व्यक्त हुईं और कभी बच्चों के लिए लिखते हुए कल्पना की एक नई दुनिया खुली। मेरे ब्लॉग ‘दिशा’ की शुरुआत भी इसी भावना से हुई थी—अपने विचारों, सपनों, अनुभवों और संवेदनाओं को शब्द देने के लिए। आज जब मैं फिर से इस मंच पर लौट रही हूँ, तो मन में उत्साह भी है और एक नई शुरुआत की खुशी भी। इस बार मेरी इच्छा है कि ‘दिशा’ केवल मेरी रचनाओं का संग्रह बनकर न रहे, बल्कि एक ऐसा साहित्यिक कोना बने जहाँ हम जीवन की छोटी-बड़ी बातों पर चर्चा कर सकें। जहाँ कविताओं में संवेदनाएँ हों, लेखों में विचार हों, कहानियों में कल्पना...