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हर मन में कुछ अनकही बातें होती हैं…

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  कुछ शब्दों में ढल जाती हैं, कुछ ख़ामोशी में रह जाती हैं। कभी-कभी मन में बहुत कुछ चलता रहता है, लेकिन होंठ ख़ामोश रहते हैं। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हम किसी से कह नहीं पाते और कुछ ऐसी, जिन्हें कहने के लिए सही शब्द ही नहीं मिलते। हम रोज़ कितने लोगों से मिलते हैं, कितनी बातें करते हैं, मुस्कुराते हैं, अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन हर मुस्कान के पीछे एक कहानी और हर ख़ामोशी के पीछे कोई न कोई एहसास छिपा हो सकता है। क्या आपने कभी सोचा है कि हम दूसरों को समझने की कोशिश तो करते हैं, लेकिन स्वयं को समझने के लिए कितना समय निकालते हैं? कभी अपने मन की भी सुनिए। उन इच्छाओं की, जिन्हें आपने जिम्मेदारियों के बीच कहीं पीछे छोड़ दिया। उन सपनों की, जिन्हें आपने यह सोचकर टाल दिया कि अभी बहुत समय है। उन भावनाओं की, जिन्हें आपने दूसरों की खुशी के लिए अनकहा रहने दिया। जीवन केवल जिम्मेदारियाँ निभाने का नाम नहीं है। यह स्वयं से जुड़ने, अपनी पसंद को पहचानने और छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करने का अवसर भी है। मेरा मानना है कि हर बात का उत्तर शब्दों में देना ...

दिशा फिर चल पड़ी है…

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  कुछ नए शब्दों के साथ, कुछ पुराने एहसासों के साथ कभी-कभी जीवन की व्यस्तताएँ हमें उस रास्ते से थोड़ा दूर ले जाती हैं, जिस पर चलना हमें सबसे अधिक प्रिय होता है। जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहता है और मन के किसी कोने में हमारी कुछ इच्छाएँ चुपचाप प्रतीक्षा करती रहती हैं। मेरे लिए लेखन भी ऐसी ही एक आत्मीय यात्रा है। शब्दों से मेरा रिश्ता केवल कागज़ पर भावनाएँ उतारने तक सीमित नहीं रहा। कभी कविता बनकर शब्दों ने मन की बात कही, कभी किसी रचना में समाज के प्रति मेरी संवेदनाएँ व्यक्त हुईं और कभी बच्चों के लिए लिखते हुए कल्पना की एक नई दुनिया खुली। मेरे ब्लॉग ‘दिशा’ की शुरुआत भी इसी भावना से हुई थी—अपने विचारों, सपनों, अनुभवों और संवेदनाओं को शब्द देने के लिए। आज जब मैं फिर से इस मंच पर लौट रही हूँ, तो मन में उत्साह भी है और एक नई शुरुआत की खुशी भी। इस बार मेरी इच्छा है कि ‘दिशा’ केवल मेरी रचनाओं का संग्रह बनकर न रहे, बल्कि एक ऐसा साहित्यिक कोना बने जहाँ हम जीवन की छोटी-बड़ी बातों पर चर्चा कर सकें। जहाँ कविताओं में संवेदनाएँ हों, लेखों में विचार हों, कहानियों में कल्पना...

वो देखो आसमान में तिरंगा ध्वज लहराता है

वो देखो आसमान में, तिरंगा ध्वज लहराता है  अनगिनत वीर सपूतों की, गाथाएँ गुनगुनाता है  हर घर तिरंगा है, हर मन तिरंगा है  एक-एक रंग तिरंगे का, देखो हमसे  बतियाता है  वो देखो आसमान में-------- सुनो रंग पहला केसरिया, साहस की कहानी है  भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, के त्याग की निशानी है  कितने ही नौजवानों ने, कितनी ही वीरांगनाओं ने  ओढ़कर केसरिया चोला, समर्पित की जवानी है  वो देखो आसमान में-------- दूजा रंग सफेद इसका, ईमानदारी सिखलाता है  लहरा-लहराकर विश्व को, शान्ति का पाठ पढ़ाता है  मिलावट न हो भावों में, बनो निर्मल गंगाजल से  खरे सोने से आदर्शों को, अपनाओ तुम, बताता है  वो देखो आसमान में-------- तीजा रंग है हरा-भरा, देखो खेतों में लहराए  देश के सारे भंडार भरे, समृद्धि का भान कराए दूर सीमाओं पर सैनिक, अपने प्राण लुटाते हैं  वतन पर मिटने वालों का, हरा रंग शौर्य है बताए  वो देखो आसमान में-------- तिरंगा आन है अपनी, तिरंगा शान है अपनी  बात जब भारत माँ की हो, तिरंगा जान है हिन्दोस्तान की  कभी न झुकने देंगे हम, क...

हिंदी से हिन्दुस्तान है

मातृभाषा पर मान है मुझको  हम सबकी ये शान है  हिंदी मेरे देश की भाषा  हिंदी से ही हिन्दुस्तान है  हिंदी वर्णों के मोती मिल  शब्दों का हार बनाते हैं  नित नया सृजन करते हैं  अद्भुत साहित्य रचाते हैं  यहीं हमें मिलते सूर कबीर  और यहीं मिलते रसखान हैं  हिंदी मेरे देश की भाषा  हिंदी से ही हिन्दुस्तान है  साहित्य की अविरल सरिता  बस यूँ ही बहती रहती है  कश्मीर से कन्याकुमारी तक  हिंदी हरदिल में बसती है  ढाई आखर प्रेम का इसका  जोड़े दे सारा जहान रे  हिंदी मेरे देश की भाषा  हिंदी से ही हिन्दुस्तान है  स्वरचित  दीपाली पंत तिवारी `दिशा’

अभी भी विकल्प है

जब तुम स्वयं नहीं सिखाओगे तो कोई और सिखा जाएगा जब तुम खुद नहीं बताओगे तो कोई और पाठ पढ़ाएगा यही होता आया है और आगे भी यही होगा तुम्हारे बच्चो का भविष्य कोई और ही गढ़ेगा तुम्हारे पास विकल्प था कि तुम उन्हें अपनी संस्कृति का ज्ञान कराते तुम्हारे पास समय था कि तुम उन्हें अपनी जड़ों का भान कराते लेकिन तुम अपनी सुविधा-असुविधा  के फेर में फँसे रहे इधर मौकापरस्त लोग  इसका ही लाभ लेते रहे आपके घर पहुँचकर , आपसे ही  आपकी पहचान करवा रहे हैं आपके पूर्वज कौन हैं, क्या है?  ये भ्रम का जाल फैला रहे हैं जागो, समझो, सोचो  क्यों ये हमारी संस्कृति के पीछे पड़े हैं क्यों इसे तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं वो अमृत में विष घोलना चाहते हैं वो आप से आपका स्वाभिमान छीन लेना चाहते हैं वो चाहते हैं कि आपके पास कुछ भी ऐसा न हो  जिस पर आप गर्व कर सकें कोशिश है उनकी कि इतिहास के पन्नों से  मान हटाकर हीनता भर सकें वो आदिपुरुष जैसे ही अनेक गाथाएँ सुनाएँगे तुम्हारे आदर्शों की धज्जियाँ उड़ाएँगे फिर कहेंगे हम तो तुम्हारा ही काम कर रहे हैं नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ रहे हैं अभी भी विकल्प है तुम्हार...

मैं वृक्ष हूँ

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 मैं वृक्ष हूँ जड़ें मेरी ज़मीन में हैं गढ़ी आँखें मेरी आसमान से लड़ीं स्वाभिमान से लहलहाता हूँ मैं दानदाता कहाता हूँ मैं मैं वृक्ष हूँ मेरा रोम-रोम समर्पित है मानवता के लिए, जो भी अर्जित है दिन-रात लुटाता हूँ मैं कभी नहीं जताता हूँ मैं मैं वृक्ष हूँ रोक लेता हूँ, भूमि के कटाव को चढ़ी नदी के बहाव को तापमान को गिराता हूँ मैं बरसात भी करवाता हूँ मैं मैं वृक्ष हूँ पथिक को देता छाया  भूखे को कंद मूल  पंछियों को आसरा दिलाता हूँ मैं जीवन आसान बनाता हूँ मैं मैं वृक्ष हूँ तुम्हारे घर में सजीं चीजों में खेत-खलिहान और बगीचों में शान से लहराता हूँ मैं कागज़-कलम बनाता हूँ मैं मैं वृक्ष हूँ रीढ़ हूँ मैं तुम्हारी मेरे बिना जीना भारी बीज़ से बीज़ बनाता हूँ मैं एक वृक्ष तुम भी लगाओ बस इतना ही चाहता हूँ मैं दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'  बैंगलूर (कर्नाटक)

यादों का मौसम

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इंतजार खत्म हुआ तपती धरती का झूम के सावन आया है खेतों में फिर झूमती-बलखाती-लहलहाती  फ़सलों का मौसम आया है इधर वन में नृत्य दिखाने को कब से मयूर था बेक़रार उधर सावन-मनभावन के आने से कोयल कूक रही है बारंबार छोटे बच्चे छप-छप करते और इतराते  रिमझिम पानी की बौछारों में बूढ़े और जवान सैर को निकले बचपन के गलियारों में देखो कागज़ की नाव बना लाया है मेरा मन भी ललचाया है तू और मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू  यादों का मौसम आया है       दीपाली पंत तिवारी 'दिशा' बैंगलौर (कर्नाटक)