बदलते समय में बचपन कहाँ खो गया?
मोबाइल की दुनिया में खोती मासूमियत, खेल और कल्पनाओं की उड़ान बचपन जीवन का वह सुंदर समय है, जब छोटी-छोटी चीज़ों में खुशियाँ मिलती हैं। कभी कागज़ की नाव बनाकर बारिश के पानी में बहाना, कभी मिट्टी के घरौंदे बनाना, कभी दोस्तों के साथ छुपन-छुपाई खेलना और कभी दादी-नानी से कहानियाँ सुनते-सुनते सो जाना—यही तो बचपन की असली पूँजी हुआ करती थी। लेकिन आज जब हम अपने आसपास के बच्चों को देखते हैं, तो एक सवाल मन में उठता है— क्या बदलते समय के साथ बचपन भी बदल गया है? मोबाइल की स्क्रीन में सिमटती दुनिया आज मोबाइल फोन, टैबलेट और डिजिटल गेम बच्चों के जीवन का हिस्सा बन गए हैं। तकनीक ने सीखने और मनोरंजन के अनेक नए अवसर दिए हैं। बच्चे घर बैठे नई जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं, शैक्षिक वीडियो देख सकते हैं और दुनिया के बारे में बहुत कुछ सीख सकते हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब स्क्रीन बच्चों के समय का इतना बड़ा हिस्सा ले लेती है कि वास्तविक खेल, बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों के लिए समय ही नहीं बचता। कभी बच्चे घर के आँगन में खेलते थे, पड़ोस के दोस्तों के साथ दौड़ते-भागते थे और अपने खेल स्वयं बनाया करते थे। ...