आखिर किस दिशा में जा रहा है हमारा समाज?
बढ़ती अराजकता, बदलते मूल्य और खोती सामाजिक संवेदनाएँ किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति, आधुनिक इमारतों, चमचमाती सड़कों और तकनीकी विकास से नहीं होती। उसकी वास्तविक पहचान वहाँ के लोगों के व्यवहार, आपसी संबंधों, नैतिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारियों और एक-दूसरे के प्रति सम्मान से बनती है। आज हम विकास की अनेक सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए हैं। दुनिया हमारी मुट्ठी में सिमट आई है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, अवसर बढ़े हैं और जीवन पहले की तुलना में अधिक आधुनिक हुआ है। लेकिन इसी विकास के बीच एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमारा सामाजिक व्यवहार भी उतना ही विकसित हुआ है? आसपास घटती घटनाएँ, छोटी-छोटी बातों पर बढ़ता विवाद, सार्वजनिक स्थानों पर अनुशासन की कमी, दूसरों के अधिकारों की अनदेखी, असहिष्णुता, हिंसा और व्यक्तिगत स्वार्थ की बढ़ती प्रवृत्ति हमें सोचने पर विवश करती है। आखिर ऐसा क्या बदल रहा है कि सुविधाएँ बढ़ने के साथ-साथ सामाजिक असंतोष और अव्यवस्था की स्थितियाँ भी दिखाई देने लगी हैं? 1. पहले और अब के समाज में क्या बद...