सच बोलना ही काफी नहीं, सच सुनने वाला भी चाहिए!
हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ सच बोलने से अधिक ज़रूरी यह हो गया है कि सच कब, कहाँ और किसके सामने बोला जाए। कभी सच को सबसे बड़ा साहस माना जाता था, लेकिन आज सच बोलने से पहले कई बार सौ बार सोचना पड़ता है। सामने वाला सच सुनने की मानसिकता रखता भी है या नहीं? कहीं आपकी स्पष्टवादिता को बदतमीज़ी, आपकी ईमानदारी को अहंकार और आपकी असहमति को विरोध न समझ लिया जाए! विडंबना देखिए, लोग अपने बारे में सच सुनना तो चाहते हैं, लेकिन केवल वही सच, जो उनकी बनाई हुई छवि को नुकसान न पहुँचाए। प्रशंसा के दो शब्द उन्हें अपना बना लेते हैं, जबकि सच के दो वाक्य उन्हें आपका विरोधी बना सकते हैं। अब तो कई जगहों पर सच बोलने वाले से ही प्रमाण माँगा जाता है, जबकि झूठ बोलने वाले को सफाई देने की आवश्यकता तक नहीं पड़ती। जो व्यक्ति चुपचाप सह ले, वह समझदार कहलाता है और जो गलत बात पर आवाज़ उठा दे, वह विवादित! लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर परिस्थिति में चुप रहना ही समझदारी है। सच को कहने का तरीका और समय चुनना विवेक है, लेकिन केवल इस डर से सच छिपा लेना कि कोई नाराज़ हो जाएगा, अपने आत्मसम्मान से समझौता करना है। हमें य...