कभी-कभी लगता है जैसे हमारी शक्ल पर लिखा है कि हम बेवकूफ हैं.जो चाहे आये और हमें लूटकर ले जाये. इस बार तो मेरे सब्र का बाँध ही टूट गया था.ऐसा लग रहा था कि नोकिया केयर के आफिस में जायें और सारी चीजें तोड़्फोड़ दें ताकि उनहें भी तो पता लगे कि बेवकूफ बनने का एहसास क्या होता है.
जब मैने नोकिया केयर के ओफिस में अपना मोबाइल ठीक कराने के लिये दिया था तब मुझे बडा़ यकीन था कि कम्पनी का मोबाइल कम्पनी की दुकान में ठीक कराना सुरक्षित रहेगा।तब मैं इस बात को भूल गयी थी कि आज विश्वास की कोइ कीमत नहीं.यह बात बहुत ही जल्दी सिद्ध हो गयी क्योकि उन्होंने मोबाइल तो ठीक नही किया अपितु उसे पूर्णतया खराब कर मेरे हाथ में थमा दिया और ऊपर से तुर्रा ये कि आपने मोबाइल को किसी साधारण दुकान में रिपेयर कराया होगा.
बस फिर क्या था उस दिन के बाद से कस्टमर केयर को फोन करने और नोकिया केयर सेन्टर के चक्कर लगाने का सिलसिला शुरू हो गया।हमने भी इस बार ठान लिया था कि चाहे कुछ हो जाये ,छोड़ेंगे नही. हमारे द्वारा लगातार उनका सिर खाने और हल्ला करने पर उन्होंने स्वीकार किया कि मोबाइल उन्ही से खराब हुआ है. अतः अगले हफ्ते आप अपना मोबाइल सही हालत में ले जाइयेगा.
तो देखा आपने हर जगह चुप रहने से भी काम नही चलता.गलत बात का विरोध भी जरूरी है.
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ब्लॉग भविष्यफल
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सोमवार, 15 जून 2009
रविवार, 14 जून 2009
कीमत देकर भी सही सर्विस की उम्मीद ना रखें
आज मेरे लिये बहुत खुशी का दिन था क्योंकि मेरे पति की दूसरी जगह नौकरी लग गयी थी. पहले वह चेन्नई में कार्यरत थे और अब उन्हें जुनीपर नेट्वर्क बैगंलौर में नौकरी मिल गयी थी. दो महीने के नोटिस के बाद वो दिन भी करीब आ गया था जब हमें बैगंलौर के लिये प्रस्थान करना था लेकिन समस्या यह थी की घर का सारा सामान दूसरे शहर कैसे जायेगा. तब हमने "मूवर्स एंड पेकर्स"की चेन्नई स्थित शाखा में सम्पर्क किया तथा उन्की मुह मांगी कीमत पर सामान ले जाने और पहुचाने का आर्डर तय हो गया. हमने उनसे यह भी कहा कि सामान हम बैंगलौर पहुँचने के हफ्ते भर बाद लेंगे.यानि शनिवार/रविवार को क्योंकि आफिस कार्यकाल में मेरे पति के लिये ये मुमकिन नही था.
अतः बैंगलौर पहुँचकर जब हमने शनिवार को मूवर्स एंड पैकर्स शाखा बैंगलौर से सम्पर्क किया तो उन्होने दोपहर तक सामान पहुँचाने का वायदा किय. इसलिए हम लोग सुबह ही अपने द्वारा चुने गये किराये के मकान पर पहुँच गये.दोपहर तक कोइ भी सूचना न मिलने पर हमने दोबारा सम्पर्क साधा उन्होने शाम तक का समय मांग लिया. अब शाम भी बीत गयी लेकिन सामान का कोइ अता-पता नही था और ना ही उनकी तरफ से कोइ फोन आया. हारकर जब हमने शाम को सात बजे फोन किया तब उन्होने रास्ते में ट्रक का टायर पंक्चर होने का बहाना बना दिया.अब हमारे सब्र का बाँध टूट गया था तब मैने खुदु उनसे बात की और कहा कि आपने हमें बेवकूफ समझ रखा है क्या,अगर आपको समान नही पहुँचाना था तो हम से कह देते ताकि हम अपने दिन का इस्तेमाल
दूसरे काम में कर लेते.खैर उन्हे तो अप्ने ही मन की करनी थी.फिर उन्होने अगले दिन सुबह छः बजे आने की बात कह दी.हम लोग गेस्ट हाउस में लौट गये और सुबह ५:३० बजे फिर किराये के मकान पर पहुँच गये लेकिन वो लोग सुबह छः बजे भी सामान नही लाये अंत में बार-बार फोने करने के बाद ११:०० बजे सामान पहुँचा.इतना होने के बाद भी उनके चेहरे पर शिकन नही थी और हम्से टिप की उम्मीद कर रहे थे. हमने भी साफ इंकार कर दिया.
इसे कह्ते हैं नाम बड़े और दर्शन छोटे.असली बात यह थी की उन्हें रविवार को उसी कालौनी में ही सामान उठाने के लिये आना था .दो दो बार आना पड़ेगा सोचकर हमारा सामान भी शनिवार के बदले रविवार को ही के आये.आज के जमाने में पैसा खर्च करने के बाद भी आपको सही सर्विस मिल जाये तो आप भाग्यशाली होगें.
अतः बैंगलौर पहुँचकर जब हमने शनिवार को मूवर्स एंड पैकर्स शाखा बैंगलौर से सम्पर्क किया तो उन्होने दोपहर तक सामान पहुँचाने का वायदा किय. इसलिए हम लोग सुबह ही अपने द्वारा चुने गये किराये के मकान पर पहुँच गये.दोपहर तक कोइ भी सूचना न मिलने पर हमने दोबारा सम्पर्क साधा उन्होने शाम तक का समय मांग लिया. अब शाम भी बीत गयी लेकिन सामान का कोइ अता-पता नही था और ना ही उनकी तरफ से कोइ फोन आया. हारकर जब हमने शाम को सात बजे फोन किया तब उन्होने रास्ते में ट्रक का टायर पंक्चर होने का बहाना बना दिया.अब हमारे सब्र का बाँध टूट गया था तब मैने खुदु उनसे बात की और कहा कि आपने हमें बेवकूफ समझ रखा है क्या,अगर आपको समान नही पहुँचाना था तो हम से कह देते ताकि हम अपने दिन का इस्तेमाल
दूसरे काम में कर लेते.खैर उन्हे तो अप्ने ही मन की करनी थी.फिर उन्होने अगले दिन सुबह छः बजे आने की बात कह दी.हम लोग गेस्ट हाउस में लौट गये और सुबह ५:३० बजे फिर किराये के मकान पर पहुँच गये लेकिन वो लोग सुबह छः बजे भी सामान नही लाये अंत में बार-बार फोने करने के बाद ११:०० बजे सामान पहुँचा.इतना होने के बाद भी उनके चेहरे पर शिकन नही थी और हम्से टिप की उम्मीद कर रहे थे. हमने भी साफ इंकार कर दिया.
इसे कह्ते हैं नाम बड़े और दर्शन छोटे.असली बात यह थी की उन्हें रविवार को उसी कालौनी में ही सामान उठाने के लिये आना था .दो दो बार आना पड़ेगा सोचकर हमारा सामान भी शनिवार के बदले रविवार को ही के आये.आज के जमाने में पैसा खर्च करने के बाद भी आपको सही सर्विस मिल जाये तो आप भाग्यशाली होगें.
गुरुवार, 11 जून 2009
एम.आर.पी.के ऊपर भी कीमत
सभी कहते है कि बंगलौर शहर बहुत महँगा है ,लेकिन तब हमें लगता था कि आजकल तो महंगाई हर जगह है फिर लोग न जाने क्यों बंगलौर के लिए ऐसा कहते है। बंगलौर आने के बाद हमारी आँखें धीरे-धीरे खुलने लगीं हैं।हमने देखा ,यहाँ तो लोग कदम-कदम पर आपको लूटने के लिए तैयार बेठे हैं । अगर आपको जरा भी जानकारी न हो तो ये लोग दो रुपए कि चीज बीस रुपए में और बीस रुपए कि चीज दो सौ रुपए में थमा दें। यही नही यहाँ आकर ही हमने देखा कि ये तो एम.आर.पी.के ऊपर भी ग्राहक से कीमत वसूलते हैं। जी हाँ , मैं सच कह रही हूँ। अगर आप डेयरी के अलावा दूध/दही कहीं और से लेते हैं तो वो दूकानदार आपसे एम.आर.पी. के ऊपर ५०पैसे ज्यादा लेगा। विरोध करने पर दूकानदार जबाव देता है कि हमें भी तो डेयरी वाले एम.आर.पी.पर देते हैं तो दुकान में दूध/दही रखने कि कीमत तो हम भी वसूलेंगे। एक तरफ़ तो सरकार "जागो ग्राहक जागो " के नारे लगाती है वहीं दूसरी और कंपनी वाले अपनी आँखें मूंदे हुऐ हैं। उपभोक्ता करे तो क्या करे? वो ख़ुद तो जाग जाता है लेकिन कंपनी वालों को कैसे जगाये ? ऐसा तो हो नही सकता कि वो लोग इन बातों से अंजान हों ।
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