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रविवार, 15 मई 2016

तुलसीदास - समन्वयवादी, समाज सुधारक और दार्शनिक विचारधारा के कवि

जिस युग में तुलसीदास जी का जन्म हुआ था उस युग में धर्म, समाज, राजनीति आदि क्षेत्रों में पारस्परिक विभेद और वैमनस्य का बोलबाला था। धर्म के क्षेत्र में एक ओर हिंदू-मुस्लिम तथा दूसरी ओर शैव-शाक्त, वैष्णव मतों में आपसी ईर्ष्या-द्वेष बढ़ता जा रहा था। हिन्दू समाज अवर्ण-सवर्ण के भेदभाव में विभज्य हो रहा था। घोर अशान्ति का वातावरण उत्पन्‍न हो गया था। ऐसे समय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने तत्कालीन परिस्थितियों का गहराई से अध्ययन करके समाज में व्याप्त वैमनस्य को दूर करने का प्रयत्‍न किया। उन्होंने इस विषमता को दूर करने के लिए समन्वय की प्रवृत्ति को अपनाया। उन्होंने धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक सभी क्षेत्रों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। अपने इसी समन्वयात्मक दृष्टिकोण के कारण तुलसीदास लोकनायक कहलाए।
शैव और वैष्णव मत का समन्वय-
तुलसीदास जी ने दोनों मतों में समन्वय स्थापित करने  के लिए एक ओर शिव के मुँह से कहलवाया-
सोई मम इष्‍ट देव रघुवीरा। सेवत जाइ सद मुनि धीरा॥
और शिव को राम जी का उपासक सिद्ध कर दिया। दूसरी ओर उन्होंने राम से कहलवाया-
शिव द्रोही मम दास कहाया। सो नर मोहि सपनेहुँ नहिं भाया॥
इस प्रकार राम को शिव जी का अनन्य प्रेमी सिद्ध कर दिया। इतना ही नहीं तुलसी ने सेतु निर्माण होने पर राम के द्वारा शिव की प्रतिष्ठा एवं पूजा-अर्चना कराके  राम को शिव का अनन्य भक्त सिद्ध कर दिया।
वैष्ण्व एवं शाक्त मत का समन्वय-
तुलसी ने वैष्णवों और शाक्तों के वैमनस्य को दूर करने के लिए शक्ति की उपासना की और सीता को ब्रह्म की शक्ति बताकर उनकी प्रार्थना की-
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाव वेद नहिं जाना॥
भव-भव विभव पराभव कारिनि। विश्‍व विमोहनि स्वनस विहारिनि॥
ज्ञान और भक्ति का समन्वय-
तुलसीदास के समय में ज्ञानियों और भक्तों में भी बड़ा विवाद था। वे एक-दूसरे को तुच्छ समझते थे। तुलसीदास ने ज्ञान और भक्ति दोनों की महत्ता स्थापित की और कहा कि दोनों मार्गों में कोई भेद नहीं है।
भगतहिं ज्ञानहिं नहिं कुछ भेदा। उभय हरहिं भव सम्भव खेदा॥
इस प्रकार उन्होंने दोनों की समता सिद्ध की। उन्होंने भक्ति को ज्ञान और वैराग्य से युक्त बताया। भक्ति ज्ञान से संयुक्त होकर ही सुशोभित होती है।
श्रुति सम्मत हरि भगति पथ संजुत विरति विवेक।
सगुण और निर्गुण का समन्वय-
तुलसीदास के समय में भक्तों में सगुण और निर्गुण को लेकर भी लोक-विवाद चला आ रहा था। सूरदास जी ने ’भ्रमरगीत’ में निर्गुण का खण्डन करते हुए सगुण की महत्ता का प्रतिपादन किया है। परंतु तुलसीदास ने निर्गुण एवं सगुण के विद्वेष को मिटाते हुए दोनों में समन्वय स्थापित किया और बताया कि निर्गुण और सगुण में कोई भेद नहीं है।
अगुनहिं सगुनहिं नहिं कुछ भेदा।
तुलसीदास जी का मानना है कि ब्रह्म निर्गुण और निराकार ही है तथापि वह दयालु और शरणागत वत्सल है और भक्तों के कष्‍ट निवारण के लिए वह सगुण रूप भी धारण करता है।
द्विज और शूद्र का समन्वय-
तुलसीदास के समय में छुआ-छूत का भेदभाव अत्यधिक बढ़ा हुआ था। उच्च वर्ग के लोग निम्‍न वर्ग के लोगों से घृणा करते थे। इस सामाजिक विषमता को दूर करने के लिए ’रामचरित मानस’ में गुरु वशिष्ठ को शूद्र निषादराज से भेंट करते हुए दिखाकर ब्राह्मण एवं शूद्रों में भी समन्वय स्थापित किया है। उन्होंने उच्च क्षत्रिय वंशी राम को वानर, भालू, रीछ आदि से प्रेमालिंगन करते दिखाकर उच्च वर्ग और निम्‍न वर्ग में समन्वय का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया है।
राजा और प्रजा में समन्वय-
तुलसीदास जी के समय में राजा और प्रजा के बीच गहरी खाई थी। उन्होंने इस खाई को दूर करने का प्रयास किया। उन्होंने बताया- ’सेवक कर पद, नयन से, मुख सो साहिब होइ’ अर्थात राजा को मुख के समान और प्रजा को हाथ, पैर व नेत्र के समान होना चाहिए। जिस तरह शरीर में मुख और अन्य अंगों के बीच तालमेल होता है, उसी तरह तुलसीदास जी ने राजा और प्रजा के समन्वय पर जोर दिया है।
मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान को एक।
पालइ पोषइ सकल अंग, तुलसी सहित विवेक॥
साहित्यिक क्षेत्र में समन्वय-
तुलसीदास जी ने समन्वय की स्थापना हेतु अवधी व ब्रज भाषा दोनों में काव्य रचना की है। यही नहीं उन्होंने रामचरितमानस में संस्कृत में श्लोकों की रचना की है। उन्होंने मात्रिक व वार्णिक दोनों प्रकार के छंदों को अपनाया है। उन्होंने प्रबंध, मुक्तक और गीति सभी काव्य-रूपों को समान महत्त्व दिया है।
दार्शनिक विचार-
तुलसीदास जी के काव्य में दार्शनिकता के भी दर्शन होते हैं। उत्तरकांड में उनके दार्शनिक विचार अत्यन्त स्पष्‍टता से व्यक्त हुए हैं। तुलसीदास जी ने राम को ब्रह्म कहा है जो नर का रूप धारण करके रघुकुल के राजा बने हैं-
परमात्मा ब्रह्म नर रूपा। होहहिं रघुकुल भूषन भूपा॥
जीव के बारे में तुलसीदास का विचार है कि जीव ईश्वर का अंश है, अविनाशी है, चेतन है और निर्मल है।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुख राशी॥
संसार के बारे में वे कहते हैं कि सारा संसार और उसके चराचर जीव सब माया से उत्पन्‍न हुए हैं-
मम माया सम्भव संसारा। जीव चराचर विविध प्रकारा॥
मोक्ष-साधन के बारे में  उनका मत स्पष्‍ट है कि ज्ञान मार्ग द्वारा मोक्ष पना अत्यंत कठिन है, परंतु राम-भजन द्वारा इच्छा न होते हुए भी यह प्राप्त हो जाता है।
भक्ति स्वतंत्र सकल गुन खानी। बिनु सत्संग न पावहि प्रानी॥
पुण्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सत्संगति करि संसृति अंता॥
निष्कर्ष-
तुलसीदास जी और उनके काव्य के विषय में जितना कहा जाए उतना कम है। वे एक उच्चकोटि के समन्वयवादी कवि थे। उन्होंने जीवन के सभी क्षेत्रों में योगदान दिया है। इसीलिए तुलसीदास एक महान कवि, लोकनायक, सफल समाज-सुधारक एवं समन्वयवाद के प्रतिष्ठापरक संत कहलाते हैं। 

सोमवार, 3 अगस्त 2009

साहित्य रत्न कवि मैथिलीशरण गुप्त

कवि मैथिलीशरण गुप्त के जन्म दिवस के अवसर पर
(३अगस्त-१८८५-१९६४)
भारतभूमि ने ऐसे-ऐसे रत्नों को जन्म दिया है जिनका डंका विश्व भर में बजता है. यह हमारा सौभाग्य है कि भारतवर्ष हमारी जन्मभूमि है. कला हो या साहित्य हर क्षेत्र में भारत अग्रणीय है. भारतभूमि के एक रत्न कवि मैथिलीशरण गुप्त जी का नाम उन श्रेष्ठ साहित्यकारों मे जाना जाता है जिन्होनें हिन्दी साहित्य को नयी ऊँचाईयां प्रदान की. गद्य हो या पद्य साहित्य के दोनों ही क्षेत्रों में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. इसका उदाहरण यह है कि मध्य प्रदेश संस्कृति राज्य मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कहा है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती प्रदेश में प्रतिवर्ष "तीन अगस्त" को "कवि दिवस" के रूप में मनायी जायेगी। यह निर्णय राज्य शासन ने लिया है। इसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को भारतीय साहित्य के स्वर्णिम इतिहास से भली-भांति अवगत कराना है और इसके लिये संस्कृति विभाग द्वारा प्रदेश में भारतीय कवियों पर केन्द्रित करते हुए अनेक आयोजन करेगा।
महान साहित्यकार मैथिलीशरण गुप्त जी के जन्म के विषय में कहा जाता है कि इनका जन्म ३ अगस्त सन १८४६ ई. में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता कौशिल्या बाई की तीसरी संतान के रुप में चिरगांव, झांसी में हुआ। बाल्यावस्था में खेलकूद में ध्यान होने से पढ़ाई छूट गयी और इन्होंने घर पर ही रहकर हिन्दी, बांग्ला तथा संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया. मुंशी अजमेरी से मार्गदर्शन प्राप्त होने के बाद इन्होंने १२ वर्ष की आयु से ब्रजभाषा में कविता लिखना आरम्भ कर दिया था. मैथिलीशरण गुप्त जी की रचनाओं में खडी़ बोली की अधिकता देखने को मिलती है. जब इनका सम्पर्क आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी से हुआ तो ये द्विवेदी जी की पत्रिका "सरस्वती" के लिये खडी़ बोली में लिखने लगे. मैथिलीशरण जी का प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग प्रकाशित हुआ फित जयद्रथ वध का प्रकाशन हुआ. गुप्त जी ने बंगाली के काव्य संग्रह "मेघनाथ वध" तथा "ब्रजांगना" का अनुवाद भी किया. देशप्रेम की भावना गुप्त जी में कूट-कूट कर भरी थी. इसका प्रमाण राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत उनकी रचना "भारत भारती"है.
मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रमुख रचनाओं में महाकाव्य-साकेत, खंडकाव्य-जयद्रथ वध, भारत भारती, पचंवटी, यशोधरा,नहुष, अंजलि और अर्घ्य, किसान, कुणाल गीत भारत झंकार. द्वापर, पृथ्वीपुत्र, मेघनाथ वध और स्वदेश गीत है. अगर उनके द्वारा अनुवाद की गयी रचनाओं की बात की जाय तो इनमें वीरांगना, स्वप्नवासवदत्ता, रत्नावली, रूबाइयात उमर खय्याम आदि हैं.मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपना पूरा जीवन साहिएय की सेवा में अर्पित कर दिया. उन्हें इसके लिये ’पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया.वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे. डाँ. नगेन्द्र के अनुसार वे सच्चे राष्ट्रकवि थे. दिनकर जी का कहना था कि गुप्त जी के काव्य के भीतर भारत की प्रचीन संस्कृति एक बार फिर तरुणावस्था को प्राप्त हुइ है.
गुप्त जी के काव्य में मानव जीवन की प्राय: सभी अवस्थाओं एवं परिस्थितियों का वर्णन हुआ है. अत: इनकी रचनाओं में सभी रसों का स्वाद मिलता है. प्रबन्ध काव्य गुप्त जी की विशिष्टता थे उन्हें इनमें सबसे अधिक सफलता प्राप्त हुई है. भारत के राष्ट्रीय उत्थान में उनकी रचना भारत भारती का अमिट योगदान है. गुप्त जी की रचनाओं में संयुक्त परिवार केन्द्र रहा है. यह उनकी रचनाओं की श्रेष्ठता को बढा़ देता है. "साकेत" में ’दशरथ जी’ का परिवार इसका उदाहरण है. गुप्त जी ने अपनी रचनाओं द्वारा उपेक्षित और शोषित नारी की दशा को भी उजागर किया है. गुप्त जी की रचनाओं से पता चलता है की वह शोषण मुक्त समाज के पक्षधर हैं. उन्हें वही राम राज्य पसंद है जहाँ एक राजा अपनी प्रजा के सुख-कल्याण के लिये अपने सभी सुखों का त्याग आसानी से कर देता है. उनके लेखन शैली बहुत ही अनूठी है. उन्होंने खड़ी बोली को इतनी सरलता से प्रयोग किया है कि उसमें ब्रजभाषा की मिठास दिखती है. गुप्त जी की सबसे प्रौढ़ रचना में ’सिद्धराज’ का नाम आता है. इसके संवादों में जो नाटकीयता है वह अन्यत्र दुर्लभ है. गुप्त जी की रचनाओं में उनके समय की सभी शैलियों की झलक मिलती है.
अंत में यही कहेंगे कि गुप्त जी हिन्दी साहित्य का वो जगमगाता सितारा है जिसकी चमक सदियों तक भी फीकी नहीं होगी. जब-जब- हिन्दी साहित्य की चर्चा होगी तब-तब उनका नाम साहित्य में योगदान के लिये लिया जायेगा. वो हिन्दी साहितय की ऐसी विभूति हैं जिन्हें कभी भी नहीं भुलाया जा सकता है.

रविवार, 2 अगस्त 2009

व्यापार जगत का महारथी

"कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" अर्थात कर्म करो और फल की इच्छा मत करो. यूँ तो हजारों लोग गीता के इस श्लोक क अर्थ जानते हैं लेकिन कुछ ही होते हैं जो इसे अपने जीवन में उतारते हैं. इन्हीं कुछ में से एक थे धीरुभाई अंबानी. एक ऐसा व्यक्तित्व जो आज किसी पहचान का मोहताज नहीं. एक ऐसा स्वप्नदर्शी जिसमें अपने सपनों को पूरा करने की लगन, हिम्मत और दूरदृष्टि थी.
धीरुभाई अंबानी का पूरा नाम धीरजलाल हीरालाल अंबानी था. लेकिन ज्यादातर लोग उन्हें धीरुभाई अंबानी के नाम से जानते हैं. अपने जीवनकाल के फर्श से अर्श तक के सफर में धीरुभाई ने कई रंग देखे जिसमें कठिनाइयाँ भी थी साथ ही मेहनत के बाद प्राप्त सफलता का स्वाद भी था. सफलता के इस सफर में उन्हें आलोचना का शिकार भी होना पड़ा. उन पर आरोप भी लगे कि उन्होंने सरकारी नीतियों को अपनी आवश्यकता के अनुसार चालाकी से बदला आदि-आदि. इन सब के बावजूद धीरुभाई अंबानी अपने मार्ग पर चलते रहे और सफलता के कई पायदान पार कर शिखर पर विराजित हुए.
धीरुभाई अंबानी आज भारतीयों के लिये एक आदर्श की तरह हैं. उनकी सफलता और चिथड़े से धनी बनने की कहानी लोगों को प्रेरित करती है. वो एक गुणी व्यवसायी होने के साथ-साथ प्रेरक कर्ता भी थे. उनके द्वारा कही गयी कई बातें मूल्यों की तरह याद रखी जाती हैं-----------मैं ना सुनने का आदि नहीं हूँ.मैं अपने दृष्टिकोण बदलता रहता हूँ. यह आप सब भी कर सकते हैं जब आप सपना देखेंगे.बड़ा सोचो, जल्दी सोचो, आगे की सोचो, विचार किसी की बपौती नहीं हैं.हमारे सपने हमेशा विशाल होने चाहिए. हमारी ख्वाइशें हमेशा ऊँची. हमारी प्रतिबद्धता हमेशा गहरी अगर आप दृढ़ता और पूर्णता से काम करेंगे तो कामयाबी आपके कदम चूमेगी.मुश्किलों में भी अपने लक्ष्यों को ढूँढिये और आपदाओं को अवसरों में तब्दील कीजिए.हारें ना, हिम्मत ही मेरा विश्वास है.युवाओं को उचित माहौल दीजिए- उन्हें प्रेरित कीजिए. उन्हे जो जरूरत है, उनकी मदद कीजिए. प्रत्येक युवा नें अनंत ऊर्जा का स्रोत है.
चलते चलते यही कहूँगी कि धीरुभाई अंबानी एक ऐसी शख्सियत थी जिसने सपनों को देखने की हिम्मत की और साथ ही उन्हें पूरा करने के लिये महान प्रयास भी किए. इसीलिए तो उनके द्वारा बोया गया कर्म का बीज आज इतना फल फूल रहा है. ऐसे कर्मयोगी को नमन करती हूँ.

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

प्रेमचंद - एक युग पुरूष

उपन्यास सम्राट मुँशी प्रेमचंद के 128 वें जन्मदिवस पर प्रेमचंद के जीवन और उनके साहित्य पर एक दृष्टि डाल रहे हैं इन्हीं के साहित्यिक वंशज प्रेमचंद सहजवालातीन दिन पहले प्रेमचंद की याद में कुछ लिखने के लिए जब प्रेमचंद सहजवाला से शैलेश भारतवासी ने आग्रह किया तो प्रेमचंद जी ने दिल्ली के कई पुस्तकालयों में अपने दो दिन लगाकर यह विश्लेषण भेजा। आगे की पोस्ट हिन्दयुग्म पर कहानी कलश में

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

रहे ना रहे हम, महका करेगें

दुनिया में कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिनके जाने के बाद भी उनकी मधुर स्मृतियाँ हमें प्रेरित करती हैं। सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती हैं. इसी श्रेणी में एक नाम और दर्ज हुआ है, वो है शास्त्रीय संगीत की मल्लिका गंगूबाई का. गीता में कहा है कि 'शरीर मरता है आत्मा नही'. गंगूबाई शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं. आज वो नहीं रहीं लेकिन उनकी संगीत शैली आत्मा के रुप में हमारे बीच विराजमान है. आगे की पोस्ट पढ़ें हिन्दयुग्म पर आवाज में...
लोग उन्हें 'गाने वाली' कहकर चिढ़ाते थे. धीरे-धीरे यह उनका उपनाम हो गया.