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महीनों के नाम

बारह महीने मिलकर, एक साल बनाते हैं एक साल में पूरे तीन सौ, पैंसठ दिन आते हैं पहला महीना चैत्र, दूसरा बैसाख है ज्येष्ठ है तीसरा, चौथा आषाढ़ है बारह महीने मिलकर, एक साल बनाते हैं एक साल में पूरे तीन सौ, पैंसठ दिन आते हैं पाँचवा महीना श्रावण (सावन), छठा भाद्रपद (भादो) है सांतवा है आश्विन (क्वार), आठवां कार्तिक है बारह महीने मिलकर, एक साल बनाते हैं एक साल में पूरे तीन सौ, पैंसठ दिन आते हैं मार्गशीर्ष (अगहन) है नवमा, दसवाँ पौष है ग्यारवां है माघ, बारहवां फाल्गुन है स्वरचित दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

ईद उल जुहा

  ईद उल जुहा अर्थात कुर्बानी की ईद, आती है, जब रमजान के सत्तर दिन जाएँ बीत । जुड़ी है इससे हजरत इब्राहिम की कहानी दी थी अल्लाह के हुक्म से अपने बेटे की कुर्बानी खुश हुए अल्लाह उनसे, परीक्षा में अव्वल वो आए और फिर अल्लाह ने दिए उनके बेटे के प्राण लौटाए उस दिन से ही ईद उल जुहा का पर्व ख़ूब मनाया जाता हज़रत की कुर्बानी को याद कर शीश नवाया जाता स्वरचित दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

कालू भालू

एक था कालू भालू था बड़ा ही चालू शैतानी करता था सबसे वो लड़ता था तब जानवरों ने ठानी उसे याद दिलाएँ नानी ढूँढ रहे थे मौका कब मिलके मारें चौका जल्दी ही वो दिन आया शिकारी ने जाल बिछाया कालू फँस गया उसमें कुछ नहीं था उसके वश में उसने आवाज़ लगाई कोई जान बचाओ भाई चिंकू चूहा बोला तुमने कब किसको छोड़ा क्यों जान बचाऊँ तुम्हारी नहीं तुमसे कोई यारी मैं तो चला अपने रस्ते तुम मरना हँसते-हँसते कालू ने पकड़े कान मेरे भाई बचाओ जान मुझको है पछतावा अब मान भी जाओ राजा चिंकू थोड़ा मुस्काया कालू के पास में आया जाल को उसने कुतरा टल गया सारा खतरा कालू ने मन में ठानी अब करूँ नहीं मनमानी खाता हूँ कसम में अब से मिलकर रहूँगा सबसे

कौन आएगा अव्वल ?

चिंकू-मीनू दोनों एक दिन बैठे थे बड़े उदास सोचें दिए हैं पेपर अच्छे क्या दोनों होंगे पास मम्मी बोली अंदर से बात है कोई खास ? गुम-सुम-गुम-सुम बैठे हो तुम दोनों साथ-साथ चिंकू-मीनू बोले मम्मी डर है हमको लगता मेहनत तो की थी हमने रिजल्ट भी हो अब अच्छा मम्मी बोली प्यारे बच्चों जो मेहनत से नहीं घबराते जीवन में ऐसे बच्चे ही हरदम अव्वल आते

बड़ों की सीख

माँ कहती है पढो-लिखो तुम बन जाओ होशियार काम करो नित अच्छे-अच्छे दो जीवन को आधार पापा भी मुझको अक्सर यही बात समझाते हैं बेटा मेहनत से ही हम अपना भाग्य बनाते हैं दादा कहते सुन लो राजू बात हमारी ध्यान से सदा बड़ों का आदर करना जीना सीना तान के दीदी मेरी बड़ी सयानी कहती है बारम्बार प्यारे भैया नासमझी से न खो देना ये दुलार मैंने भी है मन में ठानी तोड़ूँगा ना विश्‍वास सभी बड़ों का कहना मानूँ बनूँगा सबका खास

आज है धनतेरस

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पापा आज है धनतेरस ऐसे बैठे हो क्यों नीरस पता नहीं है क्या तुमको बाजार जाना है हमको दादी ने है मुझे बताया क्यों धनतेरस मनाते हैं आज के दिन बाजार से हम नई-नई चीजें लाते हैं कोइ लाता सोना-चाँदी कोइ रसोई के बर्तन फ्रिज-टीवी भी लाते हैं और लाते रोली-चंदन बोलो पापा क्या लायेंगे कुछ सोचा है तुमने मैने सोचा है लायेंगे पहले दादी के चश्मे कई दिनों से देखा मैने असमंजस में रहती है ठोकर खाती गिरती-पढती इधर-उधर फिरती है कोइ बात नहीं तुम मुझको कुछ भी मत दिलवाना अब छोडो़ अपनी दुविधा पहले दादी के चश्मे लाना दीवाली पर जब आ जायेगी उसकी आँखों की उजियाली तभी मनाऊँगा मैं पापा खुश होकर यह दीवाली

जलते हैं दिए

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Wednesday, October 14, 2009 दिये जले सबके दिल में जलते हैं दिए राह में, करने को उजियारा प्रकाश की हुयी जय, और पराजित हुआ अँधियारा आगे पढ़िए मेरी कलम से हिदयुग्म पर बाल उद्यान में

जीवन के पल

जीवन के बचे हैं थोड़े से पल इनको सँवार ले रोना नहीं कल इसके पलों को अभी तू सँवार ले इन्हीं की छाँव में जिन्दगी गुजार ले कीमती है जिन्दगी का हर एक पल जीवन के बचे हैं थोड़े से पल जिन्दगी का हर पल बाद में याद आता है जब सब कुछ बरबाद हो जाता है बरबाद होने से बचाले ये पल जीवन के बचे हैं थोड़े से पल

गर्मी

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गर्मी के मौसम में दिन हो जाता खराब रात को नींद नहीं आती ना आते मुझको ख्वा़ब दिल करे धक-धक ना होती बरसात सावन के महीने में भी सूरज फेंके आग

सुनिए आलू, भालू,चिडिया,बन्दर मामा और हाथी पर कविता

बच्चो, हर रविवार हम आपके लिए पॉडकास्ट लेकर आते हैं। आज हम लेकर आये हैं दीपाली पन्त तिवारी "दिशा" आंटी की आवाज़ में कुछ कविताएँ। दिशा आंटी बेंगलुरू में रहती हैं। इन्हें कविताएँ लिखने का शौक है।आगे की पोस्ट पढिये हिन्दयुग्म पर ....... बाल कविता