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दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

खुशनुमा ईद

अली के पैर आज ज़मीन पर नहीं थे। हो भी क्यों भई आज उसका पसंदीदा त्योहार 'ईद' जो आया था। ईद आने के  एक सप्ताह पहले से ही वो कल्पनाओं की उड़ाने भरने लगता। इस बार की ईद तो और भी ख़ास थी क्योंकि उसके मामूजान जो इस ईद पर आने वाले थे। अली तो मामूजान से मिलने वाले उपहारों के बारे में सोच-सोचकर फूला नहीं समा रहा था। फिर मामूजान के साथ उनके बच्चे ज़ेबा और फरमान भी तो आएँगे। कितना मजा आएगा।  ईद का दिन भी पास आ गया। अगले दिन ईद है लेकिन अली की निगाहें तो बस दरवाजे पर टिकी थीं। वो बड़ी बेचैनी से मामूजान और उनके परिवार का इंतजार कर रहा था।  गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वो चिल्लाता हुआ तेज़ी से दौड़ पड़ा- "मामूजान आ गए, मामूजान आ गए।" उसकी खुशी का ठिकाना न था। जब सबने आराम कर लिया तो अली अपनी उत्सुकता रोक नहीं पाया और बोला मामू आप मेरे लिए क्या-क्या तोहफ़े लाए हैं। उसकी मासूम शक्ल देखकर सब हँसने लगे अम्मी ने आँखें दिखाते हुए कहा- "चुप कर, बहुत बातें बनाने लगा है।"  तब मामूजान ने उसे प्यार से बुलाकर कहा- "क्यों नहीं। मैं तुम्हारे लिए बहुत कुछ लाया हूँ। ये लो नए कपड़े, खिलौने और ये देखो...

वर्ष 2020 के नाम पत्र

पता- श्रीमान वर्ष 2020 वर्तमान नगर शहर- जीवनगली *अप्रत्याशित परिवर्तनों व जीवन की अमूल्य नियामतों का महत्त्व समझाने वाला वर्ष-2020* प्रिय मित्र वर्ष-2020 तुम्हें प्यार भरा नमस्कार। मुझे आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि तुम जिस उद्देश्य से आए थे उसमें अवश्य ही सफल हुए होगे। हम सब भी कुशल से हैं। आज मैं आपके साथ आपके आगमन से लेकर विदाई की बेला तक के अनुभव को साँझा कर रही हूँ। बस यूँ जानिए कि जो भी उतार-चढ़ाव आए उन्हें इस पत्र में उड़ेल देना चाहती हूँ। आपको एक यादगार विदाई देने की ख़्वाहिश है मेरी।  मुझे याद है कि कैसे हम सभी जनवरी में बड़ी बेसब्री से आपके आने की राह देख रहे थे। नए-नए सपने और उम्मीदों  की भारी-भरकम पोटली लेकर हमारे नयन आपको तक रहे थे। पर ये क्या आप आए तो लेकिन ऐसा लगा जैसे इस बार कुछ सबक सिखाने के लिए आए हैं। हम लोग बस भाग रहे थे, बिना रुके, बिना सोचे-समझे, आपने तो बस ब्रेक ही लगा दिया। वो भी ऐसा-वैसा ब्रेक नहीं एयर प्रेशर वाला ब्रेक। पूरी दुनिया की रफ़्तार थाम दी। ये भी कोई तरीका होता है क्या अपनी बात समझाने का भला? हाँ मैं समझती हूँ  कि आप बताना चाहते थे कि ...

मैं हूँ बिंदास

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अल्हड़, नटखट, सुलझी हुई आत्मविश्वास से भरी हुई अंदाज है मेरा बहुत खास स्त्री हूँ मैं एकदम बिंदास पानी सा मेरा मिज़ाज हर रंग में ढल जाती हूँ दीपों सी जगमगाती मैं दीपाली कहलाती हूँ आशाओं का दामन ना छोड़ूँ कभी अंधेरों से मैं डरती नहीं महफ़िल में रौनक लाती हूँ कहते हसमुख मुझको सभी दीपाली पंत तिवारी 'दिशा' 

सावन

कोयल कूके अमवा की डाली गीत गाती मधुर-मधुर मतवाली सावन के आने का संदेशा  देती चहुँ ओर फैली हरियाली तीज-त्योहार की रौनक छाई धरती ने प्यारी छवि पाई रिमझिम-रिमझिम सावन की फुहारें मौसम ने भी ली अंगड़ाई अति पावन सावन का महीना दान-व्रत का उत्तम फल दीना बम-बम भोले के जयकारों ने सब जग की सुध-बुध ले लीना दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

स्त्री

 मुझे नाज है अपने अस्तित्व पर मैं नित नए-नए रूप बदल कर लिए भावनाओं का ज्वार- भाटा चलती हूँ अविचल कर्तव्य पथ पर अब नहीं रहती मैं डरी-डरी रहती हूँ आत्मविश्वास से भरी बदल गया है लोगों का चलन जब से मैं दुर्गा रूप धरी सभी चुनौतियों को स्वीकार कर मैं बन रही हूँ अब आत्मनिर्भर देख सकेगी दुनिया उड़ान मेरी लिखूँगी नाम अपना फलक पर दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

धोखा/विश्वासघात

आज टेंडर खुलने वाला था। रवि बेसब्री से घोषणा का इंतज़ार कर रहा था तभी परिणाम घोषित होते हैं। रवि को पता चलता है कि टेंडर उसको न मिलकर उसके जीजा जी को मिल गया है। खैर घर की बात है सोचकर रवि खुश हुआ और जीजा जी को जी भरकर बधाई व शुभकामनाएँ दीं। घर आकर रवि टेंडर मिलने की खुशी में जीजा जी के घर शाम को होने वाली पार्टी के लिए तैयार हो रहा था कि तभी उसके मैनेजर का फोन आता है कि उसके जीजा जी की कंपनी ने भी उतनी ही कुटेशन दी थी जितनी उसने स्वयं भी भरी थी। रवि इसे एक इत्तेफाक मानकर पार्टी में पहुँचता है। लेकिन वहाँ पहुँचकर उसे अपनी बहन और जीजा जी की बातें सुनाई पड़ती हैं। जीजा जी (गले में हीरों का हार पहनाते हुए) रवि की बहन ऋचा से कह रहे थे यह सब तुम्हारी मेहनत का ही नतीजा है। अगर तुम रवि की कुटेशन हमें न बताती तो आज यह टेंडर हमारी कंपनी को न  मिल पाता।  ऋचा (कुटिल मुस्कान देते हुए ) अजी इस हीरों के हार का सवाल जो था। और वातावरण में हँसी के ठहाके गूँज उठे। इधर रवि अपनी बहन द्वारा किए गए इस विश्वासघात से सन्न रह गया। वह गुलदस्ते में कार्ड लगाकर जिस पर लिखा था हीरों का हार मुबारक हो बहन कमर...

लिखे जो खत तुझे

आदरणीय समय , नमस्कार।  बताइए तो ज़रा कैसा है आपका हाल? आप तो त्रिकालदर्शी हैं। आगा-पीछा सभी जानते है। बल्कि हम सभी मनुष्य तो इस कालचक्र में ऐसे फँसे है कि इससे बाहर ही नहीं निकल पाते। कहना तो बहुत कुछ है आपसे लेकिन समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूँ और क्या छोड़ूँ। ऐसा करती हूँ कि पिछला और अगला छोड़ देती हूँ और वर्तमान पर ही गपशप करती हूँ। इस बार आपने ये कैसी करवट बदली है कि हम सभी का हाल बेहाल कर दिया है। क्या आप इस करोना के काल को खत्म नहीं कर सकते? देखिए न कैसे जन-धन की हानि हो रही है। देश की आर्थिक, सामाजिक स्थिति डाँवाडोल हो गयी है। मज़बूर लोग और ज्यादा मज़बूर हो गए हैं। अब आप ही बताएँ कि यह सब कब तक चलेगा। मैं आपसे विनती करती हूँ कि कुछ तो हम पर कृपा कीजिए और थोड़ी अपनी गति बढ़ा दीजिए ताकि यह समय जल्दी निकल जाए और फिर से वो दिन आएँ जब सब लोग घर-बाहर बिना किसी डर के आनंद से जीवन बिता पाएँ। हम सभी ये जानते हैं और मानते भी हैं कि समय बड़ा बलवान होता है और समय से पहले ना कुछ होता है ना हुआ है। इसलिए मैं आपसे करबद्ध प्रार्थना करती हूँ कि हमारी नादानियों को नज़रअंदाज़ करते हुए क्षमा कर दें। क्योंक...

सपनों का कोई जेंडर नहीं होता

उसकी आँखों की वो चमक हमेशा मुझे आकर्षित करती थी। कहने को वो अभी बस पाँच साल की थी लेकिन समझदारी व आत्मविश्वास गजब का। आज जब वो अपनी माँ के साथ घर आई तो हाथ में एक रंगीन कागज़ हवाईजहाज़ था और वो उसे ऐसे उड़ा रही थी जैसे कोई ऊँची उड़ान भरना चाहती हो। मैंने कहा अरे मैना आज ये हवाईजहाज़ क्यों? और मैना ने जवाब दिया मैडम जी ये मेरे सपनों की उड़ान है। आज हमने अपने सपने लिखे हैं इस पर। देखना मैडम जी हम एक-एक कर अपने सारे सपने पूरे करेंगे और फिरसे अपने सपनों के हवाईजहाज़ को उड़ाने में तल्लीन हो गयी। मैना की दृढ़ता को देखकर बस दिल से यही दुआ निकली कि हे ईश्वर यह मैना किसी पिंजरे में कैद न होकर रह जाए।  इसके होंसले को टूटने मत देना। -@दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'

अमोल

'अमोल' हाँ यही तो नाम था उसका। कलेक्टर के नाम की तख्ती पर इस नाम को पढ़कर भूली हुई याद ताजा हो गयी। हमारी सोसायटी में कार साफ़ करता तो कभी अख़बार डालता। कितनी बार आमना-सामना होने पर मैं उससे पूछती क्यों तुम स्कूल नहीं जाते हो क्या? तो हँसते हुए कहता हाँ-हाँ जाता हूँ न मेमसाहब! पर रात को। मुझे लगा था शायद ऐसे ही कह रहा है। लेकिन अक्सर मेरा मन यही सोचता कि पढ़ने-लिखने की उम्र में ये बच्चा इस तरह काम कर रहा है।  एक दिन जब मैं रात की शिफ्ट से लौटी तो देखा अमोल गेट के पास किताबों को हाथ में लिए रो रहा था। पूछने पर पता चला कि उसके घर वाले अब उसकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं और उसका नाम स्कूल से कटवा दिया है। वो मेरे पैरों पर गिर गया और बोला मेमसाहब मैं कुछ भी काम करूँगा लेकिन मैं पढ़ना चाहता हूँ। पढ़ाई के प्रति उसकी लगन देख मैं बहुत चकित थी। कुछ करने का आश्वासन देकर मैने अमोल को विदा किया। उसकी दर्द भरी पुकार ने रात भर सोने न दिया।  सुबह होते ही मैने अपने पति से बात की। उन्होंने कहा कि क्या तुम इतनी बड़ी जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार हो? मैंने हाँ में सिर हिला दिया। तब उन्होंने भी ...

नज़र

घर का आँगन बुहारते हुए आज फ़िर रेखा ने देखा कि सामने वाले घर का नौकर उसे ही देख रहा था। ये पहली बार नहीं था। रेखा ने पहले भी कई बार उसे स्वयं को ऐसे घूरते देखा था। रेखा का गुस्सा सातवें आसमान पर था। वो झाड़ू फेंककर सीधे उसके सामने जा पहुँची और बोली, 'आख़िर ये चल क्या रहा है? कितने दिनों से देख रही हूँ कि तुम मुझे ऐसे ही घूरते रहते हो, कुछ शर्म-लिहाज़ है या नहीं? हम अभी अंदर जाकर तुम्हारी मालकिन से शिकायत करते हैं।' वो एकदम घबरा गया और हाथ जोड़कर माफ़ी माँगने लगा। लेकिन रेखा तो आज चुप नही  रहने वाली थी बोली सच-सच बता दो नहीं तो आज तुम्हारा काम तमाम हो समझो। इतना सुनते ही उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वो रुँधे गले से बोला बहन हमारी नज़रों को बुरा न समझो। तुम्हार जित्ती हमार एक बहिन थी। दो महीने पहले करोना में चल बसी। जब हमने तुमको पहली बार देखा तो बिल्कुल हमार मुनिया जैसी ही लगी। तुमको देख हमें अपनी बहिन की बड़ी याद आती है। बार-बार तुम्हारे चेहरे पर ही हमार नज़रें टिक जात हैं। हमें माफ़ कर दो मुनिया। हम अब कभी भी ऐसे नहीं देखेंगे। सच कह रहे हैं, हमें हमारी मुनिया की कसम। रेखा को उसकी आ...

उलझे रिश्ते

  जो बुना था रिश्तों का ताना-बाना वो उलझ क्यों गया है तेरा-मेरा बरसों का प्यार और विश्वास आज दरक क्यों गया है शाम होते ही जो लौट आता घरोंदे में राही रास्ता भटक गया है आगे कुछ समझ नहीं आ रहा। क्या करूँ...... उम्म..... स्नेहिल अपनी ग़ज़ल पूरी करना चाहता था लेकिन कुछ जम नहीं रहा था उसे। तभी चारों तरफ़ काग़ज़ों का ढेर देख नीता बड़बड़ाई। अजी अपनी कल्पनाओं से कब बाहर आएँगे। इन सबसे पेट नहीं भरता। आज राशन भी खत्म हो गया है क्या कुछ इंतज़ाम होगा आज के खाने का? इतना सुनते ही स्नेहिल उठा और दराज़ खोलकर रुपए निकाले और नीता की ओर बढ़ाते हुए बोला ये लो, महाराज को भेजकर राशन मँगा लो। सब कुछ तो है पर तुम हमेशा इस प्रकार की बातें क्यों करती हो कि जैसे हम गरीबों का जीवन बिता रहे हैं। स्नेहिल रुँधे गले से बोला तुम्हारा मन क्यों नहीं भरता?   नीता भड़कते हुए बोली मैं तुम्हारी तरह संन्यासी नहीं हूँ। मैंने तुमसे शादी एशोआराम की ज़िंदगी जीने के लिए की थी नाकी तुम्हारी ये घिसी-पिटी कहानियाँ और कविताएँ सुनने के लिए। मुँह बनाते हुए खरी-खोटी सुनाकर नीता वहाँ से चली गई और स्नेहिल अपने उलझे रिश्ते की सिलवटें लिए...

बुद्धिमती

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ज्यों चीर बढ़ा कान्हा ने, द्रौपदी की लाज बचाई त्यों तिकड़म भिड़ा नारी, उसे मास्क के काम लाई उसे मास्क के काम लाई, पति को पल्लू से बाँधा बुद्धिमती ने एक ही तीर से, दो निशाना है साधा एक ओर तो पति परमेश्वर का साथ है पाया दूजी ओर भटके न पति इसका जुगाड़ लगाया। © दीपाली पंत तिवारी 'दिशा'