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मंगलवार, 31 दिसंबर 2019

एक चाँद और अंदाज़े बयां कितने

'चाँद' तो हमेशा से ही कवियों, शायरों और लेखकों का प्रिय रहा है। ना जाने कितनी उपमाएँ 'चाँद' को लेकर दी जाती रही हैं। फिल्मी गीतों में 'चाँद' का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है।

* चौदहवी का चाँद हो
* चाँद को क्या मालूम
* चंदा देखे चंदा
* चाँद छुपा बादल में
* चाँद ने कुछ कहा
* चाँद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा
* चाँद मेरा दिल चाँदनी हो तुम
* वो चाँद खिला वो तारे हँसे ये रात  अजब मतवाली है
*चाँद तारे तोड़ लाऊँ सारी दुनिया को दिखलाऊँ
*ये चाँद-सा रोशन चेहरा जुल्फों का रंग सुनहरा

ये कुछ उदाहरण हैं। इससे सिद्ध होता है कि एक चाँद है और इसके अंदाज़े बयाँ अनेक हैं। ये सिलसिला अभी थमा नहीं और ना ही थमेगा। जब तक यह दुनिया रहेगी , चाँद रहेगा और  चाँद की उपमाएँ दी जाती रहेंगी।

दीपाली 'दिशा'

रविवार, 14 अगस्त 2011

हम कौन थे ? क्या हो गए ? और क्या होंगे अभी ?............... आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी

’आजादी’ क्या सिर्फ एक शब्द है या फिर इस शब्द में बहुत गहराई है ? कुछ ऐसे ही सवाल अक्सर उमड़ते रहते हैं । लेकिन इसका उत्तर आज में नहीं, उस अतीत के बीज में है जो आजादी के पहले की पृष्‍ठभूमि की गोद में छिपा है । देश में राजा-महाराजाओं का शासनकाल था । भारत भूमि धन-धान्य तथा प्राकृतिक संपदाओं से पूर्ण थी । भारत वर्ष को सोने की चिड़िया कहा जाता था । ऋषि-मुनियों की भूमि, सत्य-अहिंसा जैसे मानव मूल्यों की जननी भारतमाता हिमालय का मुकुट धारण किए समुद्र सिंहासन पर विराजित थी । हर तरफ यही स्वरलहरी गूँजती थी-
१-जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया

देश में हर तरफ लहलहाती फसलें ऐसी प्रतीत होती थीं जैसे भारत की धरती सोना उगलती है । चहुँ और सुख-शांति का वातावरण था । प्यार की गंगा बहती थी । हमारी देश भूमि ने केवल सोना ही नहीं उगला अनेख रत्नों को भी जन्म दिया है । इन रत्नों में गांधी, सुभाष, भगत सिंह, आजाद आदि का नाम अविस्मरणीय है । इसीलिए आज भी हमारा दिल गा उठता है-
२- मेरे देश की धरती सोना उगले-उगले हीरे मोती

जब हमारी भारतभूमि सुख और अमन की पैदावार कर रही थी । तभी देश में फिरंगियों ने अपने पैर जमाने शुरु किए और देखते ही देखते ये फिरंगी पूरे भारत पर छा गये । उन्होंने चैन और अमन की धरती पर फूट और हिंसा की खेती शुरु कर दी । भाई-भाई को आपस में लड़वा दिया । जहाँ प्यार की गंगा बहती थी वहाँ अब खून की नदियाँ बहने लगीं थी । तब देश में उमड़ा इंकलाब का सैलाब । यह सैलाब ऐसा था कि भारतवासियों का रोम-रोम देशभक्‍ति की आग से जल उठा । जनता अपने प्राणों की बलि देकर भी भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए तड़प उठी। हर भारत वासी यही कहता----
३-ए वतन, ए वतन मुझको तेरी कसम

देश का बच्चा-बच्चा आजादी के हवन कुंड में अपनी आहुति देने के लिए तैयार था। यही नहीं भगत सिंह जैसे आजादी के परवाने तो आजादी को अपनी दुल्हन कहते थे । वो कहते थे कि -"माँ तू मेरा बसंती चोला रंग दे मैं आजादी की दुल्हन को ब्याह कर लाऊँगा । जब भगतसिंह., सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई तब भी उनके मुख से यही शब्द निकले थे-
४-मेरा रंग दे बसंती चोला

हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों तथा आजादी के परवानों ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए तब जाकर हमें यह आजादी नसीब हुई । उन्होंने तो आजाद भारत की झलक न देखी पर हमें वो आजादी की साँसे दे गए । एक उम्मीद और एक आस लिए जाते-जाते सिर्फ यही कह गये " कर चले हम फिदा जान और तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों"
५-कर चले हम फिदा जान

हमारे देश के वीर जवानों ने हमेशा अपना कर्तव्य निभाया है और आगे भी निभाते रहेंगे । चाहे वह स्वतंत्रता संग्राम हो या फिर कारगिल युद्ध वे कभी भी अपने फर्ज से नहीं डिगे । उनके मन में हमेशा यही डर था कि कहीं आने वाले कल में कोई उन्हें इल्जाम न दे ।
६-देखो वीर जवानों अपने खून पे ये इल्जाम न आये

खैर हमारे वीर जवानों और शहीदों ने तो अपना फर्ज़ बखूबी निभाया है। लेकिन प्रश्न तो यह उठता है कि हमने क्या किया ? आजादी के चौंसठ सालों में हम क्या से क्या हो गए । क्या हमारी आजादी इतनी सस्ती है ? क्या हमारे वीर-जवानों का खून इतना सस्ता है ? कौन है जो आगे आए और कहे "नहीं, हम अपनी आजादी को ऐसे ही मिटा नहीं सकते ।
७-अपनी आजादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं

दोस्तों आज जो देश में हालात हैं, वह फिर से उन्हीं पुराने दिनों की याद दिलाते हैं। आपसी मतभेद, आतंकवाद, जातिवाद आदि अनेक दानव भारतभूमि को फिर से निगलने को तैयार खड़े हैं । यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब एक बार हमारा देश फिर से विदेशी ताकतों का गुलाम बन जाएगा और फिर से जिन्दगी मौत के समान हो जाएगी । इसलिए सोचो और समझो-
८-ज़िन्दगी मौत न बन जाए सँभालों यारो

कहा गया है "गर तुझे तेरी गलती का एहसास है, फिर तेरे सुधरने की आस है" यदि हम सब भी अपनी गलतियों का एहसास कर स्वयं को सुधारेंगे तो एक अच्छे भविष्य की कल्पना कर सकते हैं । यदि हमें देश और आजादी का महत्व जानना है तो उन शहीदों की कुर्बानियों को याद करो जिन्होंने सरहद पर जान गँवाई और हमें आजाद भारत दे गए-
९-ए मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी

यदि हम सब सच्चे हिन्दुस्तानी हैं तो आइए एक वादा करिए और कसम उठाइए कि "आज से जो भी करेंगे देश के लिए करेंगे चाहे जान भी चले जाए पीछे नहीं हटेंगे"-
९-हर करम अपना करेंगे, ए वतन तेरे लिए


रविवार, 23 अगस्त 2009

भक्ति के सैलाब में बहते गनपति

स्वागत से लेकर विदाई तक


गणेश
जी की पूजा इस संसार में कहीं भी सबसे पहले की जाती है। भगवान गणेश सबसे अधिक पूजे जाने वाले भगवान् हैं. उनकी प्रसिद्धि इस बात से ही पता चलती है की उनके चित्र सबसे अधिक बनाये जाते हैं. हिन्दू पंचांग के अनुसार भगवान गणेश प्रत्येक महीने की चौथी तारीख को याद किये जाते हैं. किन्तु भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी कोसिद्धिविनायक चतुर्थी के नाम से जाना जाता है और इस दिन गणेश उत्सव मनाते हैं. गणेश उत्सव दस दिन तक मनाया जाने वाला उत्सव है. इस उत्सव पर लोग गणेश मूर्ति को अपने घर लाते है और दस दिनों तक उसकी पूजा-अर्चना करते हैं. दस दिनों के बाद गणेश जी की यह मूर्ति धूम धाम से सामूहिक रूप से समुद्र में विसर्जित कर दी जाती है. चारों ओर से "गणपति बप्पा मोरिया " की आवाजें सुनाई देती है तथा लोग जोर-जोर से जयकारे लगाते हुए समुद्र तट तक जाते है.

सार्वजानिक गणेश उत्सव
गणेश उत्सव महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। इसके पीछे भी एक कहानी है कि पहले यह उत्सव व्यक्तिगत रूप से मनाया जाता था। सन १८६४ में महाराष्ट्र के राजनेता बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य तिलक) जी ने सभी लोगों को आपस में जोड़ने के लिए इस उत्सव को सार्वजानिक गणेशोत्सव और जनता का गणेश उत्सव के रूप में मनाया। तभी से गणेश उत्सव सार्वजनिक रूप से मनाया जाता है। इस उत्सव को सार्वजनिक ढंग से मनाने के पीछे लोकमान्य तिलक जी का उद्देश्य हिन्दू समुदाय को एकत्रित करना तथा स्वतंत्रता सेनानियों को आपस में मिलने का अवसर देना था क्योंकि ब्रिटिश शासन में राजनैतिक सभाओं आदि को प्रतिबंधित कर रखा था. आज यह उत्सव अन्य सभी उत्सवों की तरह मनाया जाता है. जगह-जगह मंडप सजा कर उनमें गणपति की मूर्ति रखी जाती है. रंगोली सजाई जाती है और विभिन्न पकवानों का भोग लगाया जाता है. इनमें मोदक, खीर, बेसन के लड्डू, अनरसे आदि हैं. मोदक भगवान गणेश को अतिप्रिय हैं. इस दिन व्रत रखा जाता है पर ज्यादातर लोग इसे बिना व्रत के ही मानते हैं.



गणेश उत्सव का एक रूप यह भी
प्रथम पूज्य गणेश, विघ्नहर्ता गणेश, एकदंत गणेश और भी न जाने क्या-क्या नाम हैं भगवान् गणेश जी के. यहाँ तक की भगवान गणेश जी की लोकप्रियता इतनी अधिक है की आपको कुंडल में गणेश, पेंडेंट में गणेश, ग्रीटिंग कार्ड में भी गणेश जी मिल जायेंगे. लेकिन क्या हमारी भक्ति भावना यहीं तक सीमित है? क्या किसी भी इश्वर के प्रति आस्था प्रकट करने का तरीका यही है? या फिर घर में प्रभु की मूर्ति स्थापित करना और अंत में धूमधाम से उसका विसर्जन कर देना , क्या यह हमारी सही मायनों में प्रभु भक्ति है? ऐसे कई सवाल उठते हैं, जब इन तीज-त्योहारों के बाद उसी प्रथम पूज्य प्रभु को मिटटी में धूमिल और बुलडोजर तले रौंदता हुआ पाते हैं. एकतरफ हम गणेश उत्सव के दौरान गणेश जी को घर ला उनका स्वागत करते हैं. धूमधाम से उत्सव मनाते हैं वहीँ विसर्जन के बाद गणेश जी की मूर्तियाँ समंदर के किनारे कूड़े की तरह पड़ी नजर आती हैं।






















यह सच है कि इस उत्सव से बहुत लोगों कि धार्मिक भावनाएं जुडी हैं. हजारों कि रोजी रोटी भी जुडी है. क्यूंकि इन दिनों गणेश जी कि मूर्तियों कि बहुत मांग होती है. लाखों रुपयों की मूर्तियाँ खरीदी बेचीं जाती हैं. लेकिन हम जब उन्ही मूर्तियों को समंदर के पानी में डुबो देते है तो वही लाखो करोडो रूपया मिटटी में मिल जाता है. मैं यहाँ ये नहीं कह रही कि हमें त्यौहार नहीं मनाना चाहिए बल्कि सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि इतनी विशाल मूर्तियों का निर्माण न हो जिन्हें समंदर भी न समां सके. क्योंकि वह मूर्तियाँ विसर्जन के अगले दिन समंदर के किनारे खंडित हो पड़ी हुई नजर आती हैं. जिन्हें वही भक्त लोग देख कर भी अनदेखा कर देते है जिन्होंने एक दिन पहले ही भक्ति में सराबोर होकर उनका विसर्जन किया होता है. मेरा मकसद यहाँ न तो किसी को उत्तेजित करना है न ही किसी को ठेस पहचाना है. सिर्फ लोगों का ध्यान इस और दिलाना है कि हमारी आस्था किसी बुलडोजर तले रौंदी न जाए.

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

गोकुल की गलियों का ग्वाला

कृष्णपक्ष की अष्टमी के चंद्र की तरह एक पैर पर खड़े होकर, एक पैर टेढ़ा रखकर, शरीर को कमनीय मोड़ देकर इस मुरलीधर ने जिस दिन संसार में प्रथम बार प्राण फूंका, वह दिन इतिहास में अमर हो गया। बादलों की गड़गड़ाहट हो रही है, बिजली कड़कती है, मूसलधार वर्षा टूट पड़ रही है, ऐसे समय श्री कृष्ण का जन्म हुआ है। कहते हैं कि जब जीवन में अंधकार फैलता है, निराशा का वातावरण छा जाता है, आपत्ति की वर्षा टूट पड़ती है, दुःख-दैन्य के काले बादल धमकी देते हुए गड़गड़ाहट करते हैं, अनाचार चरम पर पहुँच जाता है तब कोइ एक अवतार अवतरित होता है. भगवान श्री कृष्ण ने समस्त दु:खों का नाश करने तथा पृथ्वी को संकट मुक्त करने के लिये जन्म लिया। यूँ तो भारत में अनंत अवतार हुए हैं और भारत में नररत्नों की परंपरा भी है। एक-एक गुण के लिए, एक-एक तत्व के लिए, एक-एक ध्येय के लिए कई जीवन इस देश में लोगों ने अर्पण किए हैं, ऐसे भारत देश के रत्नों की शोभा बढ़ाने वाले कौस्तुभमणि श्री कृष्ण! हैं. भगवान श्री कृष्ण में यशस्वी , विजयी योद्धा, धर्मसाम्राज्य के उत्पादक, मानव विकास की परंपरा का नैतिक मूल्य समझाने वाले उद्गाता, धर्म के महान प्रवचनकार, भक्तवत्सल और ज्ञानियों तथा जिज्ञासुओं की जिज्ञासा पूरी करने वाले जगद्गुरु आदि सभी गुण निहित हैं उनका व्यक्तित्व आकर्षक तथा प्रेरणा दायक है।
मोहरात्रि: श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासी उसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनि बजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है ।
कथा: द्वापर युग में पृथ्वी पर राक्षसो के अत्याचार बढने लगे पृथ्वी गाय का रूप धारण कर अपनी कथा सुनाने के लिए तथा उदार के लिए ब्रह्याजी के पास गई। ब्रह्याजी सब देवताओ को साथ लेकर पृथ्वी को विष्णु के पास क्षीर सागर ले गए। उस समय भगवान विष्णु अन्नत शैया पर शयन कर रहे थे। स्तुति करने पर भगवान की निद्रा भंग हो गई भगवान ने ब्रह्या एवं सब देवताओ को देखकर उनके आने का कारण पूछा तो पृथ्वी बोली-भगवान मैं पाप के बोझ से दबी जा रही हूँ। मेरा उद्धार किजिए। यह सुनकर विष्णु बोले - मैं ब्रज मण्डल में वासुदेव की पत्नी देवकी गर्भ से जन्म लूँगा। तुम सब देवतागण ब्रज भूमि में जाकर यादव वंश में अपना शरीर धारण कर लो। इतना कहकर अन्तर्ध्यान हो गए । इसके पश्चात् देवता ब्रज मण्डल में आकर यदुकुल में नन्द यशोदा तथा गोप गोपियो के रूप में पैदा हुए । द्वापर युग के अन्त में मथुरा में उग्रसेन राजा राज्य करता था। उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था कंस ने उग्रसेन को बलपूर्वक सिंहासन से उतारकर जेल में डाल दिया और स्वंय राजा बन गया कंस की बहन देवकी का विवाह यादव कुल में वासुदेव के साथ निशिचत हो गया । जब कंस देवकी को विदा करने के लिए रथ के साथ जा रहा था तो आकाशवाणी हुई कि ”हे कंस! जिस देवकी को तु बडे प्रेम से विदा करने कर रहा है उसका आँठवा पुत्र तेरा संहार करेगा। आकाशवाणी की बात सुनकर कंस क्रोध से भरकर देवकी को मारने को तैयार हो गया। उसने सोचा- ने देवकी होगी न उसका पुत्र होगा । वासुदेव जी ने कंस को समझाया कि तुम्हे देवकी से तो कोई भय नही है देवकी की आठवी सन्तान में तुम्हे सौप दूँगा। तुम्हारे समझ मे जो आये उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना कंस ने वासुदेव जी की बात स्वीकार कर ली और वासुदेव-देवकी को कारागार में बन्द कर दिया । तत्काल नारदजी वहाँ पहुँचे और कंस से बोले कि यह कैसे पता चला कि आठवाँ गर्भ कौन सा होगा गिनती प्रथम से या अन्तिम गर्भ से शुरू होगा कंस ने नादरजी के परामर्श पर देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाले समस्त बालको को मारने का निश्चय कर लिया । इस प्रकार एक-एक करके कंस ने देवकी के सात बालको को निर्दयता पूर्वक मार डाला । भाद्र पद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ उनके जन्म लेते ही जेल ही कोठरी में प्रकाश फैल गया। वासुदेव देवकी के सामने शंख, चक्र, गदा, एव पदमधारी चतुर्भुज भगवान ने अपना रूप प्रकट कर कहा,”अब मै बालक का रूप धारण करता हूँ तुम मुझे तत्काल गोकुल में नन्द के यहाँ पहुँचा दो और उनकी अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौप दो । तत्काल वासुदेव जी की हथकडियाँ खुल गई । दरवाजे अपने आप खुल गये पहरेदार सो गये वासुदेव कृष्ण को सूप में रखकर गोकुल को चल दिए रास्ते में यमुना श्रीकृष्ण के चरणो को स्पर्श करने के लिए बढने लगी भगवान ने अपने पैर लटका दिए चरण छूने के बाद यमुना घट गई वासुदेव यमुना पार कर गोकुल में नन्द के यहाँ गये बालक कृष्ण को यशोदाजी की बगल मे सुंलाकर कन्या को लेकर वापस कंस के कारागार में आ गए। जेल के दरवाजे पूर्ववत् बन्द हो गये। वासुदेव जी के हाथो में हथकडियाँ पड गई, पहरेदारजाग गये कन्या के रोने पर कंस को खबर दी गई। कंस ने कारागार मे जाकर कन्या को लेकर पत्थर पर पटक कर मारना चाहा परन्तु वह कंस के हाथो से छूटकर आकाश में उड गई और देवी का रूप धारण का बोली ,”हे कंस! मुझे मारने से क्या लाभ? तेरा शत्रु तो गोकुल में पहुच चुका है। यह दृश्य देखकर कंस हतप्रभ और व्याकुल हो गया । कंस ने श्री कृष्ण को मारने के लिए अनेक दैत्य भेजे श्रीकृष्ण ने अपनी आलौलिक माया से सारे दैत्यो को मार डाला। बडे होने पर कंस को मारकर उग्रसेन को राजगद्दी पर बैठाया । श्रीकृष्ण की पुण्य तिथि को तभी से जन्माष्टमी के रूप में सारे देश में बडे हर्षोल्लास से मनाया जाता है ।
पुराणानुसार: भविष्यपुराणके जन्माष्टमीव्रत-माहात्म्यमें यह कहा गया है कि जिस राष्ट्र या प्रदेश में यह व्रतोत्सव किया जाता है, वहां पर प्राकृतिक प्रकोप या महामारी का ताण्डव नहीं होता। मेघ पर्याप्त वर्षा करते हैं तथा फसल खूब होती है। जनता सुख-समृद्धि प्राप्त करती है। इस व्रतराजके अनुष्ठान से सभी को परम श्रेय की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला भगवत्कृपा का भागी बनकर इस लोक में सब सुख भोगता है और अन्त में वैकुंठ जाता है। कृष्णाष्टमी का व्रत करने वाले के सब क्लेश दूर हो जाते हैं। दुख-दरिद्रता से उद्धार होता है। जिन परिवारों में कलह-क्लेश के कारण अशांति का वातावरण हो, वहां घर के लोगों द्वारा जन्माष्टमी का व्रत करने से कल्याण होता है. समस्त कष्टों का नाश होता है।
कृष्णमय हो जाता है समूचा ब्रज: कृष्ण के जन्म पर ब्रज भूमि की बात न हो तो सारी बातें अधूरी हैं. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर बृज का हर घर मंदिर बन जाता है और बृज का कोना-कोना कृष्णमय हो उठता है। कृष्ण के प्रेम में रंगे बृजवासी इस अवसर पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार रहते हैं। सारा विश्व मनमोहन की अनुपम छवि को निहारने के लिए लालायित रहता है। बृज के सभी मंदिरों में जन्माष्टमी, बहुत ही धूमधाम से मनायी जाती है.वृन्दावन के राधारमण मंदिर, राधा दामोदर मंदिर एवं शाहजी मंदिर में जन्माष्टमी दिन में ही मनाई जाती है। वृन्दावन के लोग इन मंदिरों में से किसी का भी चरणामृत ग्रहण कर जन्माष्टमी व्रत के नियम का पालन करते हैं।
कृष्ण में सभी गुणों का समावेश मिलता है. कृष्ण का अवतार सभी दृष्टि से पूर्णावतार हैं। उनके जीवन में कहीं भी उंगली उठाने, न्यूनता जैसा स्थान नहीं है। एक भी स्थान ऐसा नहीं है कि जहां कमी महसूस हो। आध्यात्मिक, नैतिक या दूसरी किसी भी दृष्टि से देखेंगे तो मालूम होगा कि कृष्ण जैसा समाज उद्धारक दूसरा कोई पैदा हुआ ही नहीं है। कृष्ण की तुलना में खड़ा रह सके ऐसा राजनीतिज्ञ इस जगत्‌ में कहीं भी देखने को नहीं मिलता।अध्यात्म तो भगवान श्री कृष्ण की वैशिष्ठ्य है! कृष्ण ने निरपेक्ष रहकर रात-दिन संस्कृति के लिए कार्य किया। रात-दिन राजनीति में लीन होने वाला और कोई भी निरपेक्ष रह ही नहीं सकता है। केवल कृष्ण ही एक अपवाद हैं .उन्होंने धर्म और तत्वज्ञान के आधार पर राजसत्ता का नियंत्रण बखूबी किया तथा समाज को संदेश दिया कि अधर्मी चाहे सगा रिश्तेदार ही क्यों ना हो, उसका नाश करना हमारा कर्तव्य है. लोभी और धूर्त हमारे स्वजन कैसे हो सकते हैं. जो भी धर्म और न्याय के खिलाफ हो उसका साथ छोड़कर धर्म के मार्ग पर चलना ही समझदारी है और हमारा कर्तव्य भी है. कृष्ण की यह विचारधारा आज भी "भगवत गीता" के रूप में एक धरोहर है. भगवत गीता में निहित सद्ग्यान हमें कदम-कदम पर राह दिखाता है और अवनति के मार्ग से हटा उन्नति की और अग्रसर करता है.

रविवार, 9 अगस्त 2009

भाषावाद कहाँ तक जायज

यह सच है कि जिस तरह से मातृभूमि सबको प्रिय है उसी तरह मातृभाषा के प्रति भी लगाव होना लाज़मी है.लेकिन हर चीज की एक सीमा होनी चाहिये.’अति सर्वत्र वर्जयेत’ यानि कहीं पर भी अति नहीं होनी चाहिये. भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है जहाँ विभिन्न धर्म-जातियाँ तथा भाषायें पायी जाती हैं. यहाँ के लोग भी किसी सीमा में बँधे हुए नहीं हैं. सभी प्रान्तों के लोग अन्य प्रान्तों में बसे हुए हैं. ऐसे में अगर कोइ प्रान्त यह फैसला करे कि हमारे यहाँ सिर्फ हमारे ही प्रान्त की भाषा में स्कूलों मे शिक्षा दी जायेगी तो सरासर गलत होगा. शिक्षा पर सभी का अधिकार है और ऐसे में सिर्फ भाषा का दवाब बनाकर आप लोगों को शिक्षा से वंचित नहीं कर सकते.
हाल ही में कर्नाटक सरकार ने प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम कन्नड़ भाषा होना अनिवार्य किया है इसे कोर्ट ने भी गलत ठहराया है. क्या अपनी भाषा के प्रति प्रेम प्रदर्शित करने का सिर्फ यही तरीका है. जो लोग अन्य प्रान्तों से स्थानान्तरण कर आ बसे हैं वह केवल कन्नड़ भाषा माध्यम होने से अपने बच्चों को बीच सत्र में कहाँ दाखिला दिलायेगें. पूरे देश में या विदेशों में एक ही भाषा तो नहीं चलती है. सभी जगह अंग्रेजी एक माध्यम का कार्य करती है. अगर कोइ व्यक्ति सिर्फ कन्नड़, मलयालम, उर्दू या हिन्दी भाषा तक सीमित रह जायेगा तो वह अपने प्रान्त से निकलकर अन्य प्रान्तों में कैसे काम करेगा.
पिछले वर्ष केरल सरकार द्वारा मलयालम भाषा शिक्षा का माध्यम बनायी गयी उसका नतीजा यह निकला कि इस वर्ष केरल के प्राइमरी विद्यालयों में २.५ लाख दाखिले कम हुए. ज्यादातर माता-पिताओं ने अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने के लिये अन्य प्रान्तों का रुख किया. शिक्षा का माध्यम चुनना शिक्षा प्राप्त करने वाले का अधिकार होना चाहिये न कि सरकार का. ऐसा फैसला किस काम का जिससे बच्चों के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग जाये.
भाषा के प्रचार-प्रसार के और भी तरीके हैं. अगर सरकार अपने प्रान्त की भाषा को बढा़वा ही देना चाहती है तो वह उस भाषा को अनिवार्य विषय के तौर पर रख सकती है. इसके अलावा भाषा से जुडी साहित्यिक प्रतियोगिताओं,सेमिनार आदि का आयोजन भी इस दिशा मे अच्छा प्रयास होगा. इससे साहित्य को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ लोगों में भाषा के प्रति लगाव भी बढ़ेगा.

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

संग हो बच्चा, दर्शन हो अच्छा

भारतवर्ष एक ऐसा देश है जहाँ हर चीज का जुगाड़ है। कालेज में दाखिला हो, राजनीति में प्रवेश, रेल में सीट हो या फिर नौकरी हो हर जगह जुगाड़ चलता है। यही नही अब भगवान के दर्शन के लिये भी जुगाड़ चल गया है। यह रीति तो हमेशा से ही रही है कि नियम बनते ही उसका तोड़ ढ़ूँढ लिया जाता है. इसका एक ताजा उदाहरण समाचार पत्र में पढ़ा तो रहा नही गया. सोचा क्यो न औरों को भी अवगत करा दूँ ताकि अन्य भी इसका लाभ उठा सकें.
आगे की पोस्ट पढिये हिन्दयुग्म पर बैठक में......संग हो बच्चा, दर्शन हो अच्छा

शनिवार, 25 जुलाई 2009

धुंआ होती जिंदगी

नशा कोई भी हो, हर हाल में नुकसानदेह है। लेकिन सिगरेट पीना एक ऐसा नशा हैं जो पीने वालों के साथ-साथ ना पीने वालों को भी अपना शिकार बनाता है. सिगरेट से निकलता धुआँ सैकड़ों लोगों की जिन्दगियों में अँधेरा कर देता है. टी.बी, फेफडों का कैंसर, मुँह का कैंसर आदि बीमारियाँ तथा प्रजनन क्षमता में कमी जैसे भयानक परिणाम सामने आते हैं. किन्तु आज समाज में "हर फिक्र को धुँए में उड़ाने" की प्रवृति जन्म ले चुकी है. आगे की पोस्ट हिंद युग्म पर "धुंआ होती जिंदगी "में पढ़ें ............

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

बोर्ड की खामियों, माता-पिता की सोच और शिक्षकों के व्यवहार में बदलाव की जरूरत

आजकल बोर्ड का इम्तहान चर्चा क विषय बना हुआ है. हो भी क्यों ना, भई इसी से तो बच्चों के भविष्य की डोर बँधी हुयी है. इस विषय में सभी ने अपने-अपने विचार रखे. किसी ने बोर्ड परीक्षा को बच्चों पर बोझ और आत्महत्या का कारण बताया तो किसी ने कहा कि परीक्षा बच्चों को मज़बूत बनाती है साथ ही आगे आने वाली परिक्षाओं के लिये तैयार करती है.मुझे दोनों ही वर्गों की बातें अपनी-अपनी जगह ठीक लगीं. आगे की पोस्ट बैठक पर पढ़ें .....बोर्ड न होने से क्या होगा ?

शनिवार, 27 जून 2009

पल-पल घटता जल

कहते हैं कि पृथ्वी का ही नहीं, हमारे शरीर का भी आधे से ज्यादा हिस्सा जल से भरा हुआ है. इस तरह से देखा जाये तो जल हमारे जीवन का बहुत ही महत्वपूर्णं हिस्सा है जिसकी कमी हमारे जीवन को खतरे में डाल सकती है. ताजे समीकरणों से पता चला है कि आने वाले समय में पानी की भारी किल्लत होने वाली है.एक तो भू जल स्तर पहले ही कम हो चुका है, ऊपर से मानसून का भी कुछ अता-पता नहीं. हाल ही में मौसम विभाग ने आशंका जतायी है कि जो मानसून १५ जून तक आना था वो अभी दूर तक आता दिखायी नहीं दे रहा है..यूपी, बिहार आदि राज्यों में भारी सूखे व अकाल का संकट नज़र आ रहा है. आँकडों से यह भी पता चल रहा है नदियों तथा बाँधों में भी जलस्तर गिर गया है.
अगर देखा जाये तो यह सब हमारी ही करनी का फल है. जिस तरह तेजी से वृक्षों का कटान हुआ है उसी के चलते ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ना, मौसम में बदलाव आदि समस्याऐं खड़ी हुई हैं और नतीजन पानी की किल्लत बढ़ी है. पानी की बचत के लिये तरह-तरह के प्रचार किये जाते हैं पर हम में से कितने ऐसे हैं जो सही मायनों में पानी की बचत करते हैं. हमें तो सिर्फ अपने से मतलब है . हमारा काम हो जाये बस, बाकी किसी को कुछ मिले ना मिले हमें इससे क्या.

शुक्रवार, 26 जून 2009

विद्यालय कोइ पिकनिक स्पॉट नहीं

संस्कृत में एक श्लोक है कि"सुखार्थिनों कुतो: विद्या:,विद्यार्थिनों कुतो: सुख:"अर्थात जो सुख चाहता है उसे विद्या प्राप्त नहीं होती और जो विद्या चाहता है उसे सुख नही मिलता.यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि विद्यार्थियों को कठिन परिश्रम करना पड़ता है.विद्याध्ययन के समय उन्हें अपने सभी सुखों का त्याग करना होता है तभी वह सही मायनो में बुद्धिमान बनते हैं इसके विपरीत जो सुखों में लिप्त रहते हैं उन्हें विद्या मिलना न मिलना एक समान ही होता है यानि कई बार डिग्रियाँ होते हुए भी उनमें जानकारी का अभाव होता है.
मैंने यह संदर्भ यहाँ इसलिए दिया है क्योंकि मैं यह बताना चाहती हूँ कि एक विद्यार्थी के लिये उसकी शिक्षा ही महत्वपूर्ण होती है.शिक्षा ही उसके जीवन का आधार है और विद्यालय वह प्रांगण है जहाँ उसके जीवन की नींव रखी जाती है.तो आप ही सोचिए जो स्थान आपके जीवन में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्या वहाँ अनुशासन का होना जरूरी नहीं है ?
आज यूनिफार्म, मोबाइल आदि सभी लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं. काफी तर्क-वितर्क भी हुआ है और जारी है. मैं यहाँ यह कहना चाहती हूँ कि हर स्थान की एक गरिमा होती है. हम उसी के अनुसार वेशभूषा धारण करते हैं व आचरण करते हैं. फिर विद्यालय तो शिक्षा का मंदिर है वो कोइ पिकनिक स्पॉट तो नही जहाँ हम मनोरंजन के लिये जाते हैं. विद्यालय में बिताया हुआ हर एक पल आपकी जिन्दगी के मायने तय करता है.
प्राचीन काल में गुरुकुल परम्परा होती थी. वो इसलिये ताकि विद्यार्थी अनुशासन में रहना सीखे साथ ही ऐसे माहौल से दूर रहे जो उन्हें भ्रमित करता हो. गुरुकुल में रहकर विद्यार्थी एकाग्रचित होकर विद्याध्ययन करते थे. लेकिन आज आधुनिक युग है जहाँ सुख सुविधाओं के हजार साधन हैं. ये सभी साधन एक और हमारी सहायता करते हैं वहीं दूसरी और हमें भटकाते भी हैं. जैसेकि--आपने अपने घर में पूजा रखी है और पंडित जी पूजा करा रहे हैं लेकिन बीच-बीच में उनका मोबाइल बज रहा है. जाहिर है इससे सभी की एकाग्रता में व्यवधान पड़ेगा और आपको पंडित जी पर क्रोध भी आयेगा. ठीक इसी तरह कक्षा में बार-बार मोबाइल बजने पर व्यवधान पड़ता है. और जो पडा़ई का माहौल बना होता है वो टूट जाता है.
रही बात यूनिफार्म की तो इस विषय में सिर्फ इतना कहना चाहूँगी कि अगर विद्यालयों में यूनिफार्म होती है तो वो विद्यालय तथा विद्यार्थी दोनों की पहचान होती है. जैसे कि अगर हम कहीं पार्टी में जा रहे हैं तो उसी तरह के चमक धमक वाले कपड़े पहनते हैं उसी तरह यूनिफार्म होने से लगता है कि हम विद्यालय जा रहे हैं. लेकिन यह बात उचित नही कि केवल गर्ल्स कालेजों में यूनिफार्म होनी चाहिए. यहाँ पर बात सिर्फ विद्यालयों की होनी चाहिए चाहे वो गर्ल्स हो या बॉयज कालेज. निजी जिन्दगी में कौन क्या पहनता है या पहनती है यह सबकी अपनी मर्जी और हक़ है कि वह अपने हिसाब से चीजों को तय करे.
अंत में सिर्फ इतना ही कहना चाहुँगी कि हमारा व्यक्तित्व व आचरण ही हमारी पहचान होता है पहनावा नहीं. हाँ यह सच है कि आजकल के दिखावे के जमाने में पहनावे पर अधिक ध्यान दिया जाता है लेकिन अंत में आपके काम ,आपकी शिक्षा और आपके द्वारा किये गये प्रयासों से ही सिद्ध होते हैं.

बुधवार, 24 जून 2009

जिन्दगियों को निगलते बोरवेल और गढ्ढे




अगर साहित्यिक बात करें तो कहावत है कि"जो दूसरों के लिये गढ्ढा खोदता है वो उसमें खुद गिर जाता है" लेकिन ये कोइ साहित्यिक बात नही वरन असल जिन्दगी की बात है जहाँ गढ्ढा खोदता कोइ और है तथा उसमें गिरने वाला कोइ और होता है। जी हाँ मैं बात कर रही हूँ उन खुले हुए बोरवेल, गढ्ढों तथा नालों की ,जो ना जाने कितनी ही जाने ले चुके हैं.हम अक्सर ही अख़बार तथा चैनलों में किसी ना किसी बच्चे की इन खुले बोरवेल या गढ्ढों में गिरने से मौत की ख़बर पढ़ते-सुनते हैं. हाल ही में ऐसे कई ताजा मामले सामने आये है जिनमें कई बच्चों की मौत हो गयी है. हर बार वही ढूंढने का तथा मुआवजा देने का तमाशा होता है. लेकिन क्या मुआवजा देना इन घटनाओं का हल है ? क्यों हर बार किसी के गिरने का इंतजार होता है ? क्यों हर बार सेना का समय बर्बाद किया जाता है? क्या सेना का काम गढ्ढे में गिरे लोगों को निकालने का ही रह गया है ? ऐसे ही न जाने कितने ही प्रश्न हर बार खड़े होते है, लेकिन इनका उत्तर ना कभी खोजा गया है और ना ही खोजा जाता है . बस इंतजार होता है तो सिर्फ एक और घटना के घटित होने का.

मंगलवार, 23 जून 2009

बाग़-ऐ- बाहु



हिंदुस्तान का नक्श कुछ ऐसा है कि,कहीं भी जाओ खूबसूरती मिल ही जाती है.सच में हमारा भारतवर्ष खूबसूरत इबारतों और इमारतों से भरा हुआ है. चाहे ताजमहल हो या फिर कुतुबमीनार,लालकिला हो या फतहपुरसींकरी का बुलंद दरवाजा,देश के कोने-कोने में खूबसूरत और मनोरंजक स्थलों की कमी नही है. इन्हीं मंजरों के बीच मैं जि़क्र करने जा रही हूँ जम्मू स्थित बाग-ए-बाहु (बाहु का किला) का ,जो अपनी खूबसूरती से शहर के साथ-साथ ,आने-जाने वाले पर्यटकों को भी लुभाता है.
बाहु का किला जम्मू की सबसे पुरानी इमारत है.यह शहर के मध्य भाग से ५ किलोमीटर दूर तवी नदी के बांये किनारे स्थित है. कहते है कि यह किला ३००० वर्ष पूर्व राजा बाहूलोचन ने बनवाया था. लेकिन बाद में डोंगरा शासकों ने इसका नवनिर्माण तथा विस्तार किया. खूबसूरत झरनों,हरे-भरे बाग तथा फूलों से भरे हुए इस किले की शोभा देखते ही बनती है.ऐसा लगता है जैसे कि इससे खूबसूरत जगह पहले कहीं ना देखी हो.बाहु के किले को महाकाली के मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर किले के अंदर ही है तथा भावे वाली माता के नाम से प्रसिद्ध है. सन १८२२ में महाराजा गुलाबसिंह के राजा बनने के तुरंत बाद बनाया गया था. इस मंदिर की महत्ता वैष्णो देवी मंदिर के बाद दूसरे नंबर पर है.बल्कि यह काली माता का मंदिर भारत के प्रसिद्ध काली मंदिरों में से एक है

किले के अंदर दूर तक फ़ैला हुआ खूबसूरत बाग है इसे ही लोग बाग-ए-बाहु नाम से जानते है.इस बाग कि संरचना और प्राकृतिक सुंदरता इतनी अनोखी है कि मन मयूर नृत्य करने लगता है.तरह-तरह के फव्वारे, सीढ़ीनुमा संरचना इसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा देती है.प्राकृतिक सुंदरता से ओत-प्रोत यहां का माहौल आपको मुग्ध कर देता है और यहां से जाने का मन ही नही करता. यहां का जादुई वातावरण हजारों लोगों को आकर्षित करता है. इसलिये यह एक पिकनिक स्पाट भी बन गया है.आप चाहें पिकनिक के लिये आयें या फिर एक बार देखने के लिये, इस बाग की खूबसूरती से आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकेंगे.

सोमवार, 15 जून 2009

चेहरे के पीछे का सच

कहते हैं कि "दिल सच्चा और चेहरा झूठा,इस चेहरे ने लाखों को लूटा" यह कहावत आज चरित्रार्थ हो गयी है. जैसे ही मैने अखबार की हेड्लाइन पढ़ी कि "शाहिनी आहूजा द्वारा नौकरानी का बलात्कार"तो सहसा ही मेरे मुख से इसी गाने के बोल निकल पड़े. इस गीत के बोल कितने सटीक हैं. इंसान अपने खूबसूरत चेहरे के पीछे कितने नापाक़ मंसूबे छिपाये रहता है. फिल्मों में चरित्रवान किरदार निभाने वाले ये एक्टर कितने चरित्रहीन और वहशी हैं यह तो समय-समय पर सुर्खियों में रहता ही है, इसी दिशा में आज एक और कड़ी जुड़ गयी है.कभी-कभी लगता है कि स्त्रियाँ जायें तो जायें कहाँ ? हर जगह लोग मुखौटा लगाये रहते हैं. कहीं रिश्तेदारों का चेहरा है ,तो कहीं दोस्तों का. मालिक भी इस होड़ में पीछे नहीं हैं.

रविवार, 14 जून 2009

जाने क्या-क्या कहती हैं कहानियाँ

कहानियों का जिक्र आते ही आंखो में चमक आ जाती है और बचपन के वही हसीन पल फिर से जीने की आस जगने लगती है.वो संयुक्त परिवार जिसमें दादी-दादा,ताई-ताऊ आदि रिश्तेदारों का जमावड़ा रहता था.यहां कभी बच्चों को बहलाने के लिये तो कभी सुलाने के लिये दादी-नानी कहानियाँ सुनाया करती थी.लेकिन यह भी सच है कि ज्यादातर घरों में ये कहानियाँ बच्चों को खाना खिलाते समय सुनायी जाती थी. चाची या दादी सारे बच्चों को इक्ठ्ठा कर उन्हें गोल घेरे में बिठाकर खाना खिलाती और साथ ही कहानियाँ सुनाती जाती ताकि बच्चों का ध्यान कहानियों में लगा रहे और वो ढंग से खाना खायें.
लेकिन कहानियों का उद्देश्य सिर्फ इतना ही नहीं है. कहानियाँ कभी आपके अकेलेपन का साथी हैं तो कभी समय बिताने का जरिया. यही नही कहानियाँ सीख भी दे जाती हैं.बड़े हो या छोटे सभी को कहानियाँ पसन्द आती हैं.कई बार जो बात हम किसी से कहने में झिझकते हैं वही बात कहने का माध्यम भी कहानी बन जाती है.आजकल कहानियों का स्वरूप बदल गया है. अब एकांकी परिवारों का प्रचलन है.ऐसे में दादी- नानी तो नही होती लेकिन बाजार में कहानियों तथा कविताओं की सीडी आने लगी है। अत: हम आज भी कहानियों का आनंद ले सकते हैं।

गुरुवार, 11 जून 2009

यहाँ श्रद्धा भक्ति का कोई मोल नही

कह्ते हैं कि भगवान श्रद्धा-भक्ति और विश्वास के भूखे होते हैं. श्रद्धा से किया गया स्मरण मात्र भी प्रभु को खुश करने के लिये काफ़ी है .लेकिन उनका बनाया इंसान इन बातों को नही समझता. उसकी नजरों में पैसों के बिना किसी चीज का कोई मोल नही है.
जी हाँ मैं बात कर रही हूँ. वैष्णों धाम तथा ऐसे ही कई तीर्थों की जहां श्रद्धालु दूर-दूर से अपनी मुरादें पूरी होने की आस लिये प्रभु दर्शन को आते हैं लेकिन वहां आकर उन्हें मिलता है तिरस्कार. ’जय माता दी’ के नारों के बीच रास्ते की कठ्नाईयों को भुलाते हुए जो श्रद्धालु माता के द्वार पहुँचते हैं ,उन्हें क्या पता होता है कि यहां उनके द्वारा लायी गयी भेंट का कोई आदर नहीं अपितु उसे तो कूड़े की तरह एक कोने में फ़ेंक दिया जायेगा और प्रसाद स्वरूप उन्हें धक्के मिलेंगे ,प्रभु दर्शन तो दूर की बात है.
आज सभी तीर्थस्थानों में प्रोफ़ेशनलिज्म इस कदर हावी हो गया हैकि लोगों की भावनायें कहीं भी मायने नहीं रखती. तीर्थस्थानों में बैठे पुजारियों को तो अपने नोटों से मतलब. इनका शीश प्रभु के आगे नहीं बल्कि ५०० और १००० के नोटों की हरियाली के आगे झुकता है।

लुटेरे बाहर नहीं अन्दर हैं

रघुनाथ मंदिर एक ऐसा धर्म स्थल जो बहुत प्रसिद्ध है. वैष्णो धाम से लौटते हुए हजारों श्रद्धालु जम्मू स्थित इस स्थल पर प्रभु दर्शन के लिये अवश्य आते हैं. रघुनाथ मंदिर की प्रसिद्धता को देखते हुए और आतंकी हमले के बाद यहां चौकसी बढा़ दी गयी है.दरवाजे पर ही पुलिस चौकी है जो सभी आने जाने वालों की तलाशी लेती है ताकि कोइ लूटेरा या आतंकी मंदिर में प्रवेश न कर सके. लेकिन वे यह नही जानते कि असली लूटेरे तो मंदिर के भीतर ही हैं.
अब आप सोचेंगे कि मैं किन लूटेरों कि बात कर रही हूं. आजकल पुजारी किसी लूटेरे से कम हैं क्या? यहां मंदिर में प्रवेश करने के बाद पुजारी पाँच सौ तथा हजार के नोट दिखाकर आपको जताते हैं कि आप भी इसी तरह की दक्षिणा उनकी थाली में रखें,यदि आप ऐसा नही करते तो वो आपको खरी-खोटी सुनाने से और तिरस्कृत करने से भी चुकेंगे.इस मंदिर के प्रांगण में कई अन्य मंदिर भी हैं. अत: लूट्ने का ये सिलसिला हर मंदिर में होता है.
कहा जाता है कि "जाकी रही भावना जैसी ,प्रभु मूरत तिन देखी तैसी".अर्थात जिसकी जो भावना हो उसे वैसा ही दिखाई देता है. जहां श्रद्धालुओं के लिये पत्थर की मूरत साक्षात प्रभु हैं ,वहीं पुजारियों के लिये केवल लूटने का एक जरिया है.

उत्तरायणी मेला:कुमाउँ-गढ़वाल का अनूठा संगम


रामगंगा के किनारे बसा बरेली शहर यूँ तो कई चीजों के लिये प्रसिद्ध है लेकिन उत्तरायणी मेला यहाँ का मुख्य आकर्षण है। प्रतिवर्ष १४-१५ जनवरी को मकर संक्रान्ति के अवसर पर,उत्तरायणी मेला बरेली में आयोजित किया जाता है.कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति पर्व पर सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण मे प्रवेश करते है.इस पर्व को उत्तराँचल में धूमधाम से मनाया जाता है.यही से उत्तरायणी मेले का आरम्भ हुआ है. पर्व को उत्साहपूर्वक मनाने तथा कुमाऊँ-गढ़वाल की संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिये उत्तरायणी मेला समिति का गठन किया गया है. यही समिति हर साल उत्तरायणी मेले का आयोजन करती है. इस आयोजन में कुमाऊँ-गढ़वाल के बड़े-बड़े नेता-अभिनेता भी सहयोग प्रदान करते हैं.यही नही कुमाऊँ-गढ़वाल के लोग जो कि बरेली में रह रहे हैं,इस आयोजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. उत्तरायणी मेले का मुख्य आकर्षण यहाँ दो दिन तक लगातार चलने वाला साँस्कृतिक कार्यक्रम है.
उत्तरायणी मेला कुमाऊँ-गढ़वाल का एक ऐसा संगम है जहाँ दोनों ही मंडलों कि विभिन्न लोक कलाओं रूपी नदियाँ देखने को मिलती हैं.कुमाऊँ-गढ़वाल मंडल के विभिन्न शहरों से आये कलाकार यहाँ साँस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं. उत्तरायणी मेले का आरम्भ १४ जनवरी को शहर में शोभा यात्रा निकालकर किया जाता है. विभिन्न कलाकार सड़कों पर नृत्य करते हुए चलते हैं.इन झाँकियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे पूरा उत्तराँचल बरेली में समाहित हो गया है. शहर की शोभा देखते ही बनती है. शोभायात्रा मेला परिसर में पहुँचकर समाप्त होती है. उसके पश्चात साँस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरु हो जाता है.साँस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा मेले में कई प्रतियोगितायें भी आयोजित की जाती हैं. इनमें से मिस्टर उत्तरायणी और मिस उत्तरायणी प्रमुख है.इस प्रतियोगिता में कुमाऊँ-गढ़वाल के परिधानों तथा भाषा का विशेष ध्यान रखा जाता है. इस मेले की खासियत यह है कि यहाँ पर कुमाऊँ-गढ़वाल मंडल में मिलने वाली सामग्रियों की दुकानें लगायी जाती हैं. अत: अपने मंडल से दूर रह रहे लोगों के लिये यह सुनहरा मौका होता है जब वो अपने प्रदेश में मिलने वाली वस्तुयें खरीद सकें. जब उत्तरायणी समिति का गठन हुआ था और मेले का शुभारम्भ किया गया तब उन सदस्यों ने सोचा भी नही होगा कि उनका यह प्रयास लोगों को इतना पसंद आयेगा. पर कहते हैं न की"मै तो अकेला ही चला था मंजिल ए गाफ़िल, लोग आते गये कांरवा बनता गया" खैर संस्कृति कोइ भी हो यदि हमारा उद्देश्य साँस्कृतिक धरोहरों को बचाना है तथा उनका प्रचार करना है तो लोगों की सराहना और साथ दोनों ही मिलता है, उत्तरायणी मेला इसका उदाहरण है.

बुधवार, 3 जून 2009

उत्तरांचल और परम्पराएं

ऊँचे -ऊँचे चीड के पेड़ ,प्राकृतिक स्रोतों से बहता पानी .सीढीनुमा खेत और दूर तक जाती हुई पतली पग्दंदियाँ। हाँ कुछ ऐसा ही दृश्य हमारी आंखों के आगे छा जाता है जब हम उत्तरांचल का जिक्र करते हैं। उत्तरांचल ,एक ऐसा भूखंड है जो प्राकृतिक सौन्दर्य तथा अपने रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है। यहाँ की सांस्कृतिक धरोहरें दूर शहरों में बसे लोगों को आज भी आकर्षित करती हैं।
गीत-संगीत हो या फिर त्योहारों की रौनक उत्तरांचल की सभी परम्पराएँ बेजौड़ हैं । इनमें से उत्तरांचल की होली, रामलीला , ऐपण ,रंगयाली पिछोड़ा , नथ, घुघूती का त्यौहार आदि विशेष प्रसिद्ध हैं। यदि खान-पान की बात की जाए तो यहाँ के विशेष फल -काफल, हिशालू , किल्मौडा, पूलम हैं तथा पहाड़ी खीरा, माल्टाऔर नीबू का भी खासा नाम है। जीविका के लिए उत्तरांचल छोड़कर जो लोग शहरों में बस गए हैं , उन्हें यही परम्पराएं अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं साथ ही साथ उत्तरांचल वासी होने का एहसास उनमें सदा जीवंत रहता है।
ऐपण
उत्तरांचल में शुभावसरों पर बनायीं जाने वाली रंगोली को ऐपण कहते हैं। ऐपण कई तरह के डिजायनों से पूर्ण होता है.ऐपण के मुख्य डिजायन -चौखाने , चौपड़ , चाँद , सूरज , स्वस्तिक , गणेश ,फूल-पत्ती, बसंत्धारे तथा पो आदि हैं। ऐपण के कुछ डिजायन अवसरों के अनुसार भी होते हैं। ऐपण बनने के लिए गेरू तथा चावल के विस्वार का प्रयोग किया जाता है। आजकल ऐपण के रेडीमैड स्टीकर भी प्रचलन में हैं।
घुघूती
घुघूती उत्तरांचल का प्रसिद्द त्यौहार है.यह हर वर्ष १४-१५ जनवरी को मकरसंक्रांति के दिन मनाया जाता है । यह त्यौहार बहुत ही शुभ माना जाता है, साथ ही अन्य त्योहारों की तरह धूम धाम से मनाया जाता है। इसे घुघुते का त्यौहार भी कहते है। मकरसंक्रांति के दिन शाम को घुघुते बनाये जाते है और उन्हें माला में पिरोकर बच्चों को पहनाया जाता है । अगले दिन प्रातकाल को ये घुघुते कौऔं को खिलाये जाते है। कौऔं को बुलाने के लिए विशेष शब्दों का प्रयोग करते है। "खाले खाले कौए खाले , पूस में माघ का खाले "। ये त्यौहार सभी के लिए बहुत शुभ है क्योंकि इसी समय सूर्य दक्षिण से उत्तर में प्रवेश करते हैं ।
रंगयाली पिछोड़ा
उत्तरांचल में विवाह के आलावा अन्य शुभावसरों पर पहने जाने वाली चुनरी को रंगयाली पिछोड़ा कहते है। यह संयुक्त रूप से लाल तथा पीले रंग का होता है। ऐपण की तरह इसमें भी शंख , चक्र , स्वस्तिक , घंटा , बेल-पत्ती, फूल, आदि शुभ चिन्हों का प्रयोग होता है। पहले लोग घर पर ही कपड़ा रंग कर पिछोड़ा तैयार करते थे । प्रचलित होने के कारन अब रंगयाली पिछोड़ा रेडीमेड भी आने लगे हैं। इन्हे और सुंदर बनाने के लिए इन पर लेस , गोटा, सितारे आदि लगाए जाते हैं।
नथ
उत्तरांचल के आभूषन भी अपनी पहचान बनाने में कम नही हैं। उत्तरांचल की नथ (नाक में पहने जाने वाला गहना )अपने बड़े आकार के कारण प्रसिद्द है। यह आकार में बड़े गोलाकार की होती है और इसके ऊपर मोर आकृति आदि डिजायन बनाए जाते हैं। इन डिजायनों को बनाने के लिए नगों तथा मीनाकारी का प्रयोग जाता है।

यूँ तो उत्तरांचल की सांस्कृतिक रूप को चंद लाइनों में नही समेटा जा सकता । फिर भी इन मुख्य परम्परों से हमें उत्तरांचल के सांस्कृतिक पहलुओं की एक झलक देखने को मिलती है। अगर यह झलक हमारी परम्पराओं और संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रेरित करती है तो मेरा यह कदम सही है।








शुक्रवार, 29 मई 2009

रैगिंग नही यह काल है

ऊँची शिक्षा और एक अच्छी नौकरी, बस यही एक सपना होता है हर माँ -बाप का।अपने इस सपने को पूरा करने के लिए वो रात-दिन एक करके पैसा इकठ्ठा करते हैं और अपने बच्चों को भेज देते हैं दूर बड़े-बड़े कालेजों में शिक्षा के लिए। लेकिन उन्हें कहाँ पता होता है की वहां रैगिंग रुपी काल उनका इन्तजार कर रहा है।
सच ही तो है आज रैगिंग काल का ही रूप ले चुका है।रैगिंग रुपी काल आज हमारे देश के सैकडों होनहार बच्चों को निगल रहा है। जो बच्चे दिन-रात मेहनत कर कालेजों में एक उम्मीद के साथ दाखिला लेते हैं उन्हें वहां रैगिंग का सामना करना पड़ता है और उनके सपने वही दम तोड़ देते हैं।यूँ तो रैगिंग कानूनी अपराध बन चुका है और इसे रोकने के लिए कई क़ानून भी बन गए हैं।यही नही कालेजों के अधिकारी भी इस पर पूर्णतया रोक लगाने के दावे करते नजर आते हैं लेकिन आज भी कितने ही छात्र रैगिंग का शिकार हो रहे हैं।
यदि हमें रैगिंग को रो़कना है तो इसका उपाय केवल क़ानून बनाना नही वरन छात्र-छात्राओं का सहयोग भी जरूरी है।सीनियर विद्यार्थियों को भी सोचना चाहिए की जो उन्होंने सहा है वो आने वाले विद्यार्थियों को न सहना पड़े। तभी रैगिंग पर रो़क लग सकेगी ।वैसे भी विद्यार्थी देश का भविष्य हैं। उनके हाथों में पुस्तक और कलम तथा आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने झिलमिलाने चाहिए ,न की क़ानून की जंजीरें.

क्या ये आतंक नही

भारतीय संस्कृति धर्मनिरपेक्षता ,सहनशीलता और शान्ति का प्रतीक रही है।किंतु आज बदलते परिवेश में सब कुछ पीछे छूट गया है । एक समय था जब गांधीजी ने अहिंसा के पथ पर चल कर आजादी की लडाई लड़ी थी तथा अपने अहिंसा के पथ पर अडिग रह अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था ,पर आज लोग गांधीगिरी नही दादागिरी में विश्वास करते हैं। बिना जाने की उनके कृत्य का क्या परिणाम होगा वो हो-हल्ला शुरू कर देते हैं।

जम्मू ,लुधियाना ,फगवाडा,पंजाब ,जालंधर आदि स्थानों में घटित घटनाक्रम ,लोगो में देश के प्रति जिम्मेदारी का न होना और असहनशीलता का बदना दर्शाता है। क्या ये सही है की "करे कोई और भरे कोई "। ये सच है की वियना में भारतीय संतों के साथ जो घटित हुआ वह ग़लत था तथा पूर्णतया निंदनीय है किंतु इसका मतलब यह नही की हम विरोध करने के लिए अपने ही देश में दंगा करें अथवा अपने ही देश की संपत्ति का नाश करें। क्या कभी सोचा है की इन घटनाओं से कितने लोगों को कठनाइयों का सामना करना पड़ता है। यही नही इन बिगड़ते हालातों के चलते अनजाने ही कितने मासूमों को अपने जान गंवानी पड़ती है। हम आतंकवादियों को कोसते हैं,लेकिन विरोध जताने के लिए या फिर अपनी मांग मनवाने के लिए जो तरीका हम अपनाते हैं क्या यह किसी आतंकवादी घटना से कम है ?

जिन रेलों और बसों असुविधा होने पर हम शिकायतें करते नजर आते हैं ,उसी संपत्ति का नाश करने पर क्या हम अपने ही सुविधा के साधनों में कमी नही कर रहे हैं ? गलत बात का विरोध करना जरूरी है पर साथ ही विरोध करने का तरीका भी उचित होना चाहिए । देश के समस्त नागरिकों को एक बार इन पहलुओं पर जरूर सोचना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर विराम लगे।