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जून, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पल-पल घटता जल

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कहते हैं कि पृथ्वी का ही नहीं, हमारे शरीर का भी आधे से ज्यादा हिस्सा जल से भरा हुआ है. इस तरह से देखा जाये तो जल हमारे जीवन का बहुत ही महत्वपूर्णं हिस्सा है जिसकी कमी हमारे जीवन को खतरे में डाल सकती है. ताजे समीकरणों से पता चला है कि आने वाले समय में पानी की भारी किल्लत होने वाली है.एक तो भू जल स्तर पहले ही कम हो चुका है, ऊपर से मानसून का भी कुछ अता-पता नहीं. हाल ही में मौसम विभाग ने आशंका जतायी है कि जो मानसून १५ जून तक आना था वो अभी दूर तक आता दिखायी नहीं दे रहा है..यूपी, बिहार आदि राज्यों में भारी सूखे व अकाल का संकट नज़र आ रहा है. आँकडों से यह भी पता चल रहा है नदियों तथा बाँधों में भी जलस्तर गिर गया है. अगर देखा जाये तो यह सब हमारी ही करनी का फल है. जिस तरह तेजी से वृक्षों का कटान हुआ है उसी के चलते ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ना, मौसम में बदलाव आदि समस्याऐं खड़ी हुई हैं और नतीजन पानी की किल्लत बढ़ी है. पानी की बचत के लिये तरह-तरह के प्रचार किये जाते हैं पर हम में से कितने ऐसे हैं जो सही मायनों में पानी की बचत करते हैं. हमें तो सिर्फ अपने से मतलब है . हमारा काम हो जाये बस, बाकी किसी को कुछ...

विद्यालय कोइ पिकनिक स्पॉट नहीं

संस्कृत में एक श्लोक है कि"सुखार्थिनों कुतो: विद्या:,विद्यार्थिनों कुतो: सुख:"अर्थात जो सुख चाहता है उसे विद्या प्राप्त नहीं होती और जो विद्या चाहता है उसे सुख नही मिलता.यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि विद्यार्थियों को कठिन परिश्रम करना पड़ता है.विद्याध्ययन के समय उन्हें अपने सभी सुखों का त्याग करना होता है तभी वह सही मायनो में बुद्धिमान बनते हैं इसके विपरीत जो सुखों में लिप्त रहते हैं उन्हें विद्या मिलना न मिलना एक समान ही होता है यानि कई बार डिग्रियाँ होते हुए भी उनमें जानकारी का अभाव होता है. मैंने यह संदर्भ यहाँ इसलिए दिया है क्योंकि मैं यह बताना चाहती हूँ कि एक विद्यार्थी के लिये उसकी शिक्षा ही महत्वपूर्ण होती है.शिक्षा ही उसके जीवन का आधार है और विद्यालय वह प्रांगण है जहाँ उसके जीवन की नींव रखी जाती है.तो आप ही सोचिए जो स्थान आपके जीवन में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्या वहाँ अनुशासन का होना जरूरी नहीं है ? आज यूनिफार्म, मोबाइल आदि सभी लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं. काफी तर्क-वितर्क भी हुआ है और जारी है. मैं यहाँ यह कहना चाहती हूँ कि हर स्थान की एक गरिमा हो...

प्यासी धरती करे पुकार

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प्यासी धरती करे पुकार सुन लो हे जग के करतार सूख गयी है मेरी कोख़ तन पे ना गिरी जरा भी ओस कौन बुझाये मेरी प्यास प्यासी धरती करे पुकार कुआँ , पोखर और तालाब जोहते हैं बारिश की बाट कहीं नहीं पानी की बूँदे बाँध और नदिया तट सूने कुछ तो करो विचार प्यासी धरती करे पुकार किसान करते हैं करुण क्रंदन कहाँ से उपजेगा अब अन्न सूनी आँखे, सूखे होठ कहीं न छाया कहीं न ओट पडी़ सीने में मेरे दरा़र प्यासी धरती करे पुकार

जिन्दगियों को निगलते बोरवेल और गढ्ढे

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अगर साहित्यिक बात करें तो कहावत है कि"जो दूसरों के लिये गढ्ढा खोदता है वो उसमें खुद गिर जाता है" लेकिन ये कोइ साहित्यिक बात नही वरन असल जिन्दगी की बात है जहाँ गढ्ढा खोदता कोइ और है तथा उसमें गिरने वाला कोइ और होता है। जी हाँ मैं बात कर रही हूँ उन खुले हुए बोरवेल, गढ्ढों तथा नालों की ,जो ना जाने कितनी ही जाने ले चुके हैं.हम अक्सर ही अख़बार तथा चैनलों में किसी ना किसी बच्चे की इन खुले बोरवेल या गढ्ढों में गिरने से मौत की ख़बर पढ़ते-सुनते हैं. हाल ही में ऐसे कई ताजा मामले सामने आये है जिनमें कई बच्चों की मौत हो गयी है. हर बार वही ढूंढने का तथा मुआवजा देने का तमाशा होता है. लेकिन क्या मुआवजा देना इन घटनाओं का हल है ? क्यों हर बार किसी के गिरने का इंतजार होता है ? क्यों हर बार सेना का समय बर्बाद किया जाता है? क्या सेना का काम गढ्ढे में गिरे लोगों को निकालने का ही रह गया है ? ऐसे ही न जाने कितने ही प्रश्न हर बार खड़े होते है, लेकिन इनका उत्तर ना कभी खोजा गया है और ना ही खोजा जाता है . बस इंतजार होता है तो सिर्फ एक और घटना के घटित होने का.

बाग़-ऐ- बाहु

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हिंदुस्तान का नक्श कुछ ऐसा है कि,कहीं भी जाओ खूबसूरती मिल ही जाती है.सच में हमारा भारतवर्ष खूबसूरत इबारतों और इमारतों से भरा हुआ है. चाहे ताजमहल हो या फिर कुतुबमीनार,लालकिला हो या फतहपुरसींकरी का बुलंद दरवाजा,देश के कोने-कोने में खूबसूरत और मनोरंजक स्थलों की कमी नही है. इन्हीं मंजरों के बीच मैं जि़क्र करने जा रही हूँ जम्मू स्थित बाग-ए-बाहु (बाहु का किला) का ,जो अपनी खूबसूरती से शहर के साथ-साथ ,आने-जाने वाले पर्यटकों को भी लुभाता है. बाहु का किला जम्मू की सबसे पुरानी इमारत है.यह शहर के मध्य भाग से ५ किलोमीटर दूर तवी नदी के बांये किनारे स्थित है. कहते है कि यह किला ३००० वर्ष पूर्व राजा बाहूलोचन ने बनवाया था. लेकिन बाद में डोंगरा शासकों ने इसका नवनिर्माण तथा विस्तार किया. खूबसूरत झरनों,हरे-भरे बाग तथा फूलों से भरे हुए इस किले की शोभा देखते ही बनती है.ऐसा लगता है जैसे कि इससे खूबसूरत जगह पहले कहीं ना देखी हो.बाहु के किले को महाकाली के मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर किले के अंदर ही है तथा भावे वाली माता के नाम से प्रसिद्ध है. सन १८२२ में महाराजा गुलाबसिंह के राजा बनने के तुरंत बाद...

क्यों जन्म लूँ मैं धरती पर

हाहाकार मचा तब पृथ्वी पर घटने लगी जब कन्या जन्म दर हर तरफ पुरूष ही दिखते थे सब नारी को तरसते थे इन्द्र का भी सिंहासन डोला वो पहुँचा प्रभु के पास और बोला हे नाथ, करो कुछ ठोस उपाय कैसे पृथ्वी पर कन्या जाय सब देवों ने किया विचार विमर्श ऋषियों से भी लिया परामर्श चिंतन कर खोजा एक उपाय एक नारी की उत्पत्ति की जाय प्रभु ने की नारी की रचना उद्देश्य बताया उसको अपना जल्दी जाओ तुम धरती पर बढा़ओ कन्या जन्म दर नारी बोली क्यों जाऊँ मैं क्यूँ दर-दर की ठोकर खाऊँ मैं घर में न मेरा कोई सम्मान बाहर भी मिले मुझको अपमान मैं सृष्टि रचती हूँ अपने अंदर कठिन प्रसव पीडा़ सहकर मुझको क्या फल मिलता उसका सौदा होता मेरी अस्मत का है मरण मुझे स्वीकार प्रभु पर जन्म न लूँ मैं अब कबहु प्रभु खड़े रहे निरूत्तर अब कौन जाये धरती पर ?

पत्रकारिता:गये वो ज़माने

गये वो ज़माने जब पत्रकारिता आम इंसा की आवाज बना करती थी तब तो पत्रकारों की तस्वीर भी अलग हुआ करती थी ना जाने कितने ही कवियों ने कलम को तलवार बनाया देश और समाज से जुड़े कई मुद्दों को उठाया पर बदल गया है आजकल इसका स्वरूप नोटों की ताकत ने बना दिया है इसे कुरूप अब कलम एक हथियार है आम जनता ही इसका शिकार है आज ख़बरों में एन्टरटेनमैंट मिलता है इसी से तो टीआरपी लेवल बढ़ता है निज स्वार्थ ही सर्वोपरि है देश और जनता की किसे पड़ी है

चेहरे के पीछे का सच

कहते हैं कि "दिल सच्चा और चेहरा झूठा,इस चेहरे ने लाखों को लूटा" यह कहावत आज चरित्रार्थ हो गयी है. जैसे ही मैने अखबार की हेड्लाइन पढ़ी कि "शाहिनी आहूजा द्वारा नौकरानी का बलात्कार"तो सहसा ही मेरे मुख से इसी गाने के बोल निकल पड़े. इस गीत के बोल कितने सटीक हैं. इंसान अपने खूबसूरत चेहरे के पीछे कितने नापाक़ मंसूबे छिपाये रहता है. फिल्मों में चरित्रवान किरदार निभाने वाले ये एक्टर कितने चरित्रहीन और वहशी हैं यह तो समय-समय पर सुर्खियों में रहता ही है, इसी दिशा में आज एक और कड़ी जुड़ गयी है.कभी-कभी लगता है कि स्त्रियाँ जायें तो जायें कहाँ ? हर जगह लोग मुखौटा लगाये रहते हैं. कहीं रिश्तेदारों का चेहरा है ,तो कहीं दोस्तों का. मालिक भी इस होड़ में पीछे नहीं हैं.

मुस्कान

अधखिले होठों पर फैली हल्की सी मुस्कान दे जाती है आँखों में चमक और चेहरे पर रौनक हाँ यह मुस्कान ही तो है जो डाल दे पत्थर में भी प्राण अधखिले होठों पर फैली हल्की सी मुस्कान कभी सोये शिशु के अधरों पर छलक जाती तो कभी दो दिन से भूखे भिखारी को मिलने वाली रोटी के संग उसके चेहरे पर खिल जाती अधखिले होठों पर फैली हल्की सी मुस्कान जब प्यासे को मिले पानी और डूबते को तिनके का सहारा तब भी बरबस होठों से ढलक जाती है ये मुस्कान अधखिले होठों पर फैली हल्की सी मुस्कान कोई बिछडा़ मिले बरसों बाद या कोई बिखरा घरोंदा हो आबाद फिर सजती है यह चेहरे पर और छोड़ जाती है अपने निशान अधखिले होठों पर फैली हल्की सी मुस्कान

अगर विरोध ना करो तो कोइ नही सुनता

कभी-कभी लगता है जैसे हमारी शक्ल पर लिखा है कि हम बेवकूफ हैं.जो चाहे आये और हमें लूटकर ले जाये. इस बार तो मेरे सब्र का बाँध ही टूट गया था.ऐसा लग रहा था कि नोकिया केयर के आफिस में जायें और सारी चीजें तोड़्फोड़ दें ताकि उनहें भी तो पता लगे कि बेवकूफ बनने का एहसास क्या होता है. जब मैने नोकिया केयर के ओफिस में अपना मोबाइल ठीक कराने के लिये दिया था तब मुझे बडा़ यकीन था कि कम्पनी का मोबाइल कम्पनी की दुकान में ठीक कराना सुरक्षित रहेगा।तब मैं इस बात को भूल गयी थी कि आज विश्वास की कोइ कीमत नहीं.यह बात बहुत ही जल्दी सिद्ध हो गयी क्योकि उन्होंने मोबाइल तो ठीक नही किया अपितु उसे पूर्णतया खराब कर मेरे हाथ में थमा दिया और ऊपर से तुर्रा ये कि आपने मोबाइल को किसी साधारण दुकान में रिपेयर कराया होगा. बस फिर क्या था उस दिन के बाद से कस्टमर केयर को फोन करने और नोकिया केयर सेन्टर के चक्कर लगाने का सिलसिला शुरू हो गया।हमने भी इस बार ठान लिया था कि चाहे कुछ हो जाये ,छोड़ेंगे नही. हमारे द्वारा लगातार उनका सिर खाने और हल्ला करने पर उन्होंने स्वीकार किया कि मोबाइल उन्ही से खराब हुआ है. अतः अगले हफ्ते आप अपना मोबाइल...

कीमत देकर भी सही सर्विस की उम्मीद ना रखें

आज मेरे लिये बहुत खुशी का दिन था क्योंकि मेरे पति की दूसरी जगह नौकरी लग गयी थी. पहले वह चेन्नई में कार्यरत थे और अब उन्हें जुनीपर नेट्वर्क बैगंलौर में नौकरी मिल गयी थी. दो महीने के नोटिस के बाद वो दिन भी करीब आ गया था जब हमें बैगंलौर के लिये प्रस्थान करना था लेकिन समस्या यह थी की घर का सारा सामान दूसरे शहर कैसे जायेगा. तब हमने "मूवर्स एंड पेकर्स"की चेन्नई स्थित शाखा में सम्पर्क किया तथा उन्की मुह मांगी कीमत पर सामान ले जाने और पहुचाने का आर्डर तय हो गया. हमने उनसे यह भी कहा कि सामान हम बैंगलौर पहुँचने के हफ्ते भर बाद लेंगे.यानि शनिवार/रविवार को क्योंकि आफिस कार्यकाल में मेरे पति के लिये ये मुमकिन नही था. अतः बैंगलौर पहुँचकर जब हमने शनिवार को मूवर्स एंड पैकर्स शाखा बैंगलौर से सम्पर्क किया तो उन्होने दोपहर तक सामान पहुँचाने का वायदा किय. इसलिए हम लोग सुबह ही अपने द्वारा चुने गये किराये के मकान पर पहुँच गये.दोपहर तक कोइ भी सूचना न मिलने पर हमने दोबारा सम्पर्क साधा उन्होने शाम तक का समय मांग लिया. अब शाम भी बीत गयी लेकिन सामान का कोइ अता-पता नही था और ना ही उनकी तरफ से कोइ फोन आय...

जाने क्या-क्या कहती हैं कहानियाँ

कहानियों का जिक्र आते ही आंखो में चमक आ जाती है और बचपन के वही हसीन पल फिर से जीने की आस जगने लगती है.वो संयुक्त परिवार जिसमें दादी-दादा,ताई-ताऊ आदि रिश्तेदारों का जमावड़ा रहता था.यहां कभी बच्चों को बहलाने के लिये तो कभी सुलाने के लिये दादी-नानी कहानियाँ सुनाया करती थी.लेकिन यह भी सच है कि ज्यादातर घरों में ये कहानियाँ बच्चों को खाना खिलाते समय सुनायी जाती थी. चाची या दादी सारे बच्चों को इक्ठ्ठा कर उन्हें गोल घेरे में बिठाकर खाना खिलाती और साथ ही कहानियाँ सुनाती जाती ताकि बच्चों का ध्यान कहानियों में लगा रहे और वो ढंग से खाना खायें. लेकिन कहानियों का उद्देश्य सिर्फ इतना ही नहीं है. कहानियाँ कभी आपके अकेलेपन का साथी हैं तो कभी समय बिताने का जरिया. यही नही कहानियाँ सीख भी दे जाती हैं.बड़े हो या छोटे सभी को कहानियाँ पसन्द आती हैं.कई बार जो बात हम किसी से कहने में झिझकते हैं वही बात कहने का माध्यम भी कहानी बन जाती है.आजकल कहानियों का स्वरूप बदल गया है. अब एकांकी परिवारों का प्रचलन है.ऐसे में दादी- नानी तो नही होती लेकिन बाजार में कहानियों तथा कविताओं की सीडी आने लगी है। अत: हम आज भी कहानिय...

पिता ही तो है

जब-जब महानता का प्रश्न उठा है हम सभी ने माँ को ही चुना है ये सही है कि माँ अतुलनीय है लेकिन पिता का ओहदा भी कुछ कम नही है माँ जन्म देती है,तो पिता ऊँगली पकड़ चलाता है हमारे भरण-पोषण का भार उठाता है लड़खड़ाताहै जब भी कदम हमारा हाथ दे बन जाता है वो सहारा नारियल की तरह है पिता का प्यार ऊपर से सख्त,अन्दर से नम्रता का भण्डार हमने जब भी कोई,सपना बुना है पिता ही तो है,जिसने उसे सुना है दिया है जीवन को आधार अनमोल है पिता का दुलार खो ना जायें भीड़ में कहीं, यही सोचकर उठा लेता है वो हमें, अपने कांधों पर कभी पिठ्ठू तो कभी घोडा़ बना है हमारे लिये हर दु:ख दर्द सहा है

यहाँ श्रद्धा भक्ति का कोई मोल नही

कह्ते हैं कि भगवान श्रद्धा-भक्ति और विश्वास के भूखे होते हैं. श्रद्धा से किया गया स्मरण मात्र भी प्रभु को खुश करने के लिये काफ़ी है .लेकिन उनका बनाया इंसान इन बातों को नही समझता. उसकी नजरों में पैसों के बिना किसी चीज का कोई मोल नही है. जी हाँ मैं बात कर रही हूँ. वैष्णों धाम तथा ऐसे ही कई तीर्थों की जहां श्रद्धालु दूर-दूर से अपनी मुरादें पूरी होने की आस लिये प्रभु दर्शन को आते हैं लेकिन वहां आकर उन्हें मिलता है तिरस्कार. ’जय माता दी’ के नारों के बीच रास्ते की कठ्नाईयों को भुलाते हुए जो श्रद्धालु माता के द्वार पहुँचते हैं ,उन्हें क्या पता होता है कि यहां उनके द्वारा लायी गयी भेंट का कोई आदर नहीं अपितु उसे तो कूड़े की तरह एक कोने में फ़ेंक दिया जायेगा और प्रसाद स्वरूप उन्हें धक्के मिलेंगे ,प्रभु दर्शन तो दूर की बात है. आज सभी तीर्थस्थानों में प्रोफ़ेशनलिज्म इस कदर हावी हो गया हैकि लोगों की भावनायें कहीं भी मायने नहीं रखती. तीर्थस्थानों में बैठे पुजारियों को तो अपने नोटों से मतलब. इनका शीश प्रभु के आगे नहीं बल्कि ५०० और १००० के नोटों की हरियाली के आगे झुकता है।

लुटेरे बाहर नहीं अन्दर हैं

रघुनाथ मंदिर एक ऐसा धर्म स्थल जो बहुत प्रसिद्ध है. वैष्णो धाम से लौटते हुए हजारों श्रद्धालु जम्मू स्थित इस स्थल पर प्रभु दर्शन के लिये अवश्य आते हैं. रघुनाथ मंदिर की प्रसिद्धता को देखते हुए और आतंकी हमले के बाद यहां चौकसी बढा़ दी गयी है.दरवाजे पर ही पुलिस चौकी है जो सभी आने जाने वालों की तलाशी लेती है ताकि कोइ लूटेरा या आतंकी मंदिर में प्रवेश न कर सके. लेकिन वे यह नही जानते कि असली लूटेरे तो मंदिर के भीतर ही हैं. अब आप सोचेंगे कि मैं किन लूटेरों कि बात कर रही हूं. आजकल पुजारी किसी लूटेरे से कम हैं क्या? यहां मंदिर में प्रवेश करने के बाद पुजारी पाँच सौ तथा हजार के नोट दिखाकर आपको जताते हैं कि आप भी इसी तरह की दक्षिणा उनकी थाली में रखें,यदि आप ऐसा नही करते तो वो आपको खरी-खोटी सुनाने से और तिरस्कृत करने से भी चुकेंगे.इस मंदिर के प्रांगण में कई अन्य मंदिर भी हैं. अत: लूट्ने का ये सिलसिला हर मंदिर में होता है. कहा जाता है कि "जाकी रही भावना जैसी ,प्रभु मूरत तिन देखी तैसी".अर्थात जिसकी जो भावना हो उसे वैसा ही दिखाई देता है. जहां श्रद्धालुओं के लिये पत्थर की मूरत साक्षात प्रभु हैं ,...

उत्तरायणी मेला:कुमाउँ-गढ़वाल का अनूठा संगम

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रामगंगा के किनारे बसा बरेली शहर यूँ तो कई चीजों के लिये प्रसिद्ध है लेकिन उत्तरायणी मेला यहाँ का मुख्य आकर्षण है। प्रतिवर्ष १४-१५ जनवरी को मकर संक्रान्ति के अवसर पर,उत्तरायणी मेला बरेली में आयोजित किया जाता है.कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति पर्व पर सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण मे प्रवेश करते है.इस पर्व को उत्तराँचल में धूमधाम से मनाया जाता है.यही से उत्तरायणी मेले का आरम्भ हुआ है. पर्व को उत्साहपूर्वक मनाने तथा कुमाऊँ-गढ़वाल की संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिये उत्तरायणी मेला समिति का गठन किया गया है. यही समिति हर साल उत्तरायणी मेले का आयोजन करती है. इस आयोजन में कुमाऊँ-गढ़वाल के बड़े-बड़े नेता-अभिनेता भी सहयोग प्रदान करते हैं.यही नही कुमाऊँ-गढ़वाल के लोग जो कि बरेली में रह रहे हैं,इस आयोजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. उत्तरायणी मेले का मुख्य आकर्षण यहाँ दो दिन तक लगातार चलने वाला साँस्कृतिक कार्यक्रम है. उत्तरायणी मेला कुमाऊँ-गढ़वाल का एक ऐसा संगम है जहाँ दोनों ही मंडलों कि विभिन्न लोक कलाओं रूपी नदियाँ देखने को मिलती हैं.कुमाऊँ-गढ़वाल मंडल के विभिन्न शहरों से आये कलाकार यहाँ साँस्कृतिक ...

एम.आर.पी.के ऊपर भी कीमत

सभी कहते है कि बंगलौर शहर बहुत महँगा है ,लेकिन तब हमें लगता था कि आजकल तो महंगाई हर जगह है फिर लोग न जाने क्यों बंगलौर के लिए ऐसा कहते है। बंगलौर आने के बाद हमारी आँखें धीरे-धीरे खुलने लगीं हैं।हमने देखा ,यहाँ तो लोग कदम-कदम पर आपको लूटने के लिए तैयार बेठे हैं । अगर आपको जरा भी जानकारी न हो तो ये लोग दो रुपए कि चीज बीस रुपए में और बीस रुपए कि चीज दो सौ रुपए में थमा दें। यही नही यहाँ आकर ही हमने देखा कि ये तो एम.आर.पी.के ऊपर भी ग्राहक से कीमत वसूलते हैं। जी हाँ , मैं सच कह रही हूँ। अगर आप डेयरी के अलावा दूध/दही कहीं और से लेते हैं तो वो दूकानदार आपसे एम.आर.पी. के ऊपर ५०पैसे ज्यादा लेगा। विरोध करने पर दूकानदार जबाव देता है कि हमें भी तो डेयरी वाले एम.आर.पी.पर देते हैं तो दुकान में दूध/दही रखने कि कीमत तो हम भी वसूलेंगे। एक तरफ़ तो सरकार "जागो ग्राहक जागो " के नारे लगाती है वहीं दूसरी और कंपनी वाले अपनी आँखें मूंदे हुऐ हैं। उपभोक्ता करे तो क्या करे? वो ख़ुद तो जाग जाता है लेकिन कंपनी वालों को कैसे जगाये ? ऐसा तो हो नही सकता कि वो लोग इन बातों से अंजान हों ।

उत्तरांचल और परम्पराएं

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ऊँचे -ऊँचे चीड के पेड़ ,प्राकृतिक स्रोतों से बहता पानी .सीढीनुमा खेत और दूर तक जाती हुई पतली पग्दंदियाँ। हाँ कुछ ऐसा ही दृश्य हमारी आंखों के आगे छा जाता है जब हम उत्तरांचल का जिक्र करते हैं। उत्तरांचल ,एक ऐसा भूखंड है जो प्राकृतिक सौन्दर्य तथा अपने रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है। यहाँ की सांस्कृतिक धरोहरें दूर शहरों में बसे लोगों को आज भी आकर्षित करती हैं। गीत-संगीत हो या फिर त्योहारों की रौनक उत्तरांचल की सभी परम्पराएँ बेजौड़ हैं । इनमें से उत्तरांचल की होली, रामलीला , ऐपण ,रंगयाली पिछोड़ा , नथ, घुघूती का त्यौहार आदि विशेष प्रसिद्ध हैं। यदि खान-पान की बात की जाए तो यहाँ के विशेष फल -काफल, हिशालू , किल्मौडा, पूलम हैं तथा पहाड़ी खीरा, माल्टाऔर नीबू का भी खासा नाम है। जीविका के लिए उत्तरांचल छोड़कर जो लोग शहरों में बस गए हैं , उन्हें यही परम्पराएं अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं साथ ही साथ उत्तरांचल वासी होने का एहसास उनमें सदा जीवंत रहता है। ऐपण उत्तरांचल में शुभावसरों पर बनायीं जाने वाली रंगोली को ऐपण कहते हैं। ऐपण कई तरह के डिजायनों से पूर्ण होता है.ऐपण के मुख्य डिजायन -चौखाने , च...