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गुरुवार, 22 अगस्त 2013

बरसाती मेढक













दोस्तों कुछ लोग होते हैं बड़े ही विचित्र
हर शुक्रवार को बदले सिनेमाहॉल में जैसे चलचित्र
इसी कारण तो सभी कहें इनको बरसाती मेढक
आते ही मुसीबतों की वर्षा करते दोस्तों संग बैठक
अक्सर ये सच्ची दोस्ती का राग अलापते हैं
इसी के नाम पर अपना काम निकालते हैं
रंग बदलना इनकी फितरत में शामिल है
सच पूछो ये इंसानियत के कातिल हैं
यही नहीं गिरगिट भी इन पर गुस्सा करता है
करते हो मुझे क्यों बदनाम  ऐसा अक्सर कहता है
इतने रंग तो मैंने भी नहीं बदले जितने तुम लोग बदलते हो
बरसात जाते ही गधे के सिर से सींग जैसे नदारद मिलते हो

रक्षाबंधन












इस धागे में बँधा है प्यार अपार
बहन की भाई के लिए दुआएँ हज़ार
अपनों के लिए सुरक्षा का विश्‍वास
हमेशा करीब बने रहने का अहसास

यह डोर सुदूर भी दिल के तारों को जोड़ देती है
हमारी ज़िन्दगी में दूरियों को पाट नित नए मोड़ देती है
खोल देती है भावनाओं के बंद द्‍वार
हटाए उपजी हुई द्‍वेष की खरपतवार

शनिवार, 20 जुलाई 2013

ख़्वाब

पलखों के बंद झरोखों से
बहुत से ख़्वाब देखे थे मैंने
आकाश पर टिमटिमाते अनगिनत
तारों की तरह सुनहरे, सुंदर,
रुपहले, झिलमिलाते ख़्वाब
इस डर से कभी न उठाई पलखें
कहीं माँग न ले कोई इनका हिसाब
घुटने की आदत हो गई है इन ख़्वाबों को
अब ये नहीं पुकारते
लेकिन ये भी सच है कि अपनी खामोशियों में ही
कहीं है अक्सर चित्कारते
कब तक करूँ अनसुनी इस पुकार को
कैसे खोलूँ इन बंद पिंजरों के द्‍वार को
है प्रश्‍न कि यह अन्तर्द्वंद कब तलक चलता रहेगा?
और कब इन ख़्वाबों को हकीकत का रंग मिलेगा ?

बदलाव की बयार भली लग रही है

बदलाव की बयार भली लग रही है
जो न थे तैयार उन्हें खल रही है

अक्सर भूल जाते हैं पायदानों पर चढ़ने वाले
तरक्की की पहली सीढ़ी नीचे से ही चढ़ी है

बोए थे जो बीज कभी एक उम्र पहले
उसकी फसल आज पक कर  खड़ी है

हो रहे हैं पस्त अब हौंसले दुश्मनों के
उम्मीद की किरण ए दिशा दिख रही है

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

इंतजार का फल मीठा होता है

देर ही से सही हर एक ख्वाब सच होता है
सच ही तो है कर्मों का हिसाब यहीं होता है

यूँ तो ग़मों के दौर में कई बार एतबार टूटा मेरा
ये अब जाना इंतजार का फल भी मीठा होता है

कोई कितना ही समझे कि वो खुदा हो गया है
ए दिशा सबके चेहरे का नकाब यहीं हटता है

शनिवार, 29 जून 2013

समझो ए नादनो

काश ये नांदा समझ पाते इन इशारों को
हमने गिरते देखा है कितनी ही बुलंद मीनारों को

आज जो जर्रा है कल फलक पर पहुँच सकता है
आसमान पर चमकते चाँद को भी ग्रहण लग सकता है

वक्‍त का ऊँट कहो कब इक करवट बैठा है
बिन पेंदी का लोटा है कहीं भी लुढ़क सकता है

समझो इन हवाओं के रुख को ए नासमझो
घमंड से भरा ये सर कभी भी कट सकता है

गुरुवार, 20 जून 2013

प्रकृति का आक्रोश




















सीना फटा आकाश का
या धरती ने करवट ली है
ए दोस्तों समझो इसको
ये प्रकृति ने दस्तक दी है

खिलौने के जैसे खेलते हैं हम
जब तब इन प्राकृतिक उपादानों से
तंग आ गई है अब कुदरत भी
हम धूर्त, कपटी और नादानों से

कब तलक चुप बैठे, सिसके
और तड़पती रहे अपने हाल पे
चाख हृदय लेकर झपटी तो
ग्रास बन गए हम काल के

सुनो इस वीभत्स चित्कार को
या फिर कहूँ इस ललकार को
गर अब भी न बदला चलन
फिर कौन रोकेगा इस तलवार को