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बुधवार, 24 जून 2009

जिन्दगियों को निगलते बोरवेल और गढ्ढे




अगर साहित्यिक बात करें तो कहावत है कि"जो दूसरों के लिये गढ्ढा खोदता है वो उसमें खुद गिर जाता है" लेकिन ये कोइ साहित्यिक बात नही वरन असल जिन्दगी की बात है जहाँ गढ्ढा खोदता कोइ और है तथा उसमें गिरने वाला कोइ और होता है। जी हाँ मैं बात कर रही हूँ उन खुले हुए बोरवेल, गढ्ढों तथा नालों की ,जो ना जाने कितनी ही जाने ले चुके हैं.हम अक्सर ही अख़बार तथा चैनलों में किसी ना किसी बच्चे की इन खुले बोरवेल या गढ्ढों में गिरने से मौत की ख़बर पढ़ते-सुनते हैं. हाल ही में ऐसे कई ताजा मामले सामने आये है जिनमें कई बच्चों की मौत हो गयी है. हर बार वही ढूंढने का तथा मुआवजा देने का तमाशा होता है. लेकिन क्या मुआवजा देना इन घटनाओं का हल है ? क्यों हर बार किसी के गिरने का इंतजार होता है ? क्यों हर बार सेना का समय बर्बाद किया जाता है? क्या सेना का काम गढ्ढे में गिरे लोगों को निकालने का ही रह गया है ? ऐसे ही न जाने कितने ही प्रश्न हर बार खड़े होते है, लेकिन इनका उत्तर ना कभी खोजा गया है और ना ही खोजा जाता है . बस इंतजार होता है तो सिर्फ एक और घटना के घटित होने का.

1 टिप्पणी:

  1. Disha ji,
    aapki baat bikul theek hai parantu haal mein is tarah ke hadse itni jyada hamari nazaron mein aaye ki ham sochne ko mazboor ho gaye ki kya vastav mein yah 'durghatna' thi ya fir iska manchan kiya gaya tha, camere ki chakachaudh, lakhon nazaron ka kisi par tik jana bhi , prasidhi mil jana kafi hota hai aisi ghatnaon ko janm dene ke liye.
    aapka lekh bahut accha laga,
    ek baar fir badhai

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