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रविवार, 14 जून 2009

जाने क्या-क्या कहती हैं कहानियाँ

कहानियों का जिक्र आते ही आंखो में चमक आ जाती है और बचपन के वही हसीन पल फिर से जीने की आस जगने लगती है.वो संयुक्त परिवार जिसमें दादी-दादा,ताई-ताऊ आदि रिश्तेदारों का जमावड़ा रहता था.यहां कभी बच्चों को बहलाने के लिये तो कभी सुलाने के लिये दादी-नानी कहानियाँ सुनाया करती थी.लेकिन यह भी सच है कि ज्यादातर घरों में ये कहानियाँ बच्चों को खाना खिलाते समय सुनायी जाती थी. चाची या दादी सारे बच्चों को इक्ठ्ठा कर उन्हें गोल घेरे में बिठाकर खाना खिलाती और साथ ही कहानियाँ सुनाती जाती ताकि बच्चों का ध्यान कहानियों में लगा रहे और वो ढंग से खाना खायें.
लेकिन कहानियों का उद्देश्य सिर्फ इतना ही नहीं है. कहानियाँ कभी आपके अकेलेपन का साथी हैं तो कभी समय बिताने का जरिया. यही नही कहानियाँ सीख भी दे जाती हैं.बड़े हो या छोटे सभी को कहानियाँ पसन्द आती हैं.कई बार जो बात हम किसी से कहने में झिझकते हैं वही बात कहने का माध्यम भी कहानी बन जाती है.आजकल कहानियों का स्वरूप बदल गया है. अब एकांकी परिवारों का प्रचलन है.ऐसे में दादी- नानी तो नही होती लेकिन बाजार में कहानियों तथा कविताओं की सीडी आने लगी है। अत: हम आज भी कहानियों का आनंद ले सकते हैं।

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