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बुधवार, 3 जून 2009

उत्तरांचल और परम्पराएं

ऊँचे -ऊँचे चीड के पेड़ ,प्राकृतिक स्रोतों से बहता पानी .सीढीनुमा खेत और दूर तक जाती हुई पतली पग्दंदियाँ। हाँ कुछ ऐसा ही दृश्य हमारी आंखों के आगे छा जाता है जब हम उत्तरांचल का जिक्र करते हैं। उत्तरांचल ,एक ऐसा भूखंड है जो प्राकृतिक सौन्दर्य तथा अपने रीति-रिवाजों के लिए जाना जाता है। यहाँ की सांस्कृतिक धरोहरें दूर शहरों में बसे लोगों को आज भी आकर्षित करती हैं।
गीत-संगीत हो या फिर त्योहारों की रौनक उत्तरांचल की सभी परम्पराएँ बेजौड़ हैं । इनमें से उत्तरांचल की होली, रामलीला , ऐपण ,रंगयाली पिछोड़ा , नथ, घुघूती का त्यौहार आदि विशेष प्रसिद्ध हैं। यदि खान-पान की बात की जाए तो यहाँ के विशेष फल -काफल, हिशालू , किल्मौडा, पूलम हैं तथा पहाड़ी खीरा, माल्टाऔर नीबू का भी खासा नाम है। जीविका के लिए उत्तरांचल छोड़कर जो लोग शहरों में बस गए हैं , उन्हें यही परम्पराएं अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती हैं साथ ही साथ उत्तरांचल वासी होने का एहसास उनमें सदा जीवंत रहता है।
ऐपण
उत्तरांचल में शुभावसरों पर बनायीं जाने वाली रंगोली को ऐपण कहते हैं। ऐपण कई तरह के डिजायनों से पूर्ण होता है.ऐपण के मुख्य डिजायन -चौखाने , चौपड़ , चाँद , सूरज , स्वस्तिक , गणेश ,फूल-पत्ती, बसंत्धारे तथा पो आदि हैं। ऐपण के कुछ डिजायन अवसरों के अनुसार भी होते हैं। ऐपण बनने के लिए गेरू तथा चावल के विस्वार का प्रयोग किया जाता है। आजकल ऐपण के रेडीमैड स्टीकर भी प्रचलन में हैं।
घुघूती
घुघूती उत्तरांचल का प्रसिद्द त्यौहार है.यह हर वर्ष १४-१५ जनवरी को मकरसंक्रांति के दिन मनाया जाता है । यह त्यौहार बहुत ही शुभ माना जाता है, साथ ही अन्य त्योहारों की तरह धूम धाम से मनाया जाता है। इसे घुघुते का त्यौहार भी कहते है। मकरसंक्रांति के दिन शाम को घुघुते बनाये जाते है और उन्हें माला में पिरोकर बच्चों को पहनाया जाता है । अगले दिन प्रातकाल को ये घुघुते कौऔं को खिलाये जाते है। कौऔं को बुलाने के लिए विशेष शब्दों का प्रयोग करते है। "खाले खाले कौए खाले , पूस में माघ का खाले "। ये त्यौहार सभी के लिए बहुत शुभ है क्योंकि इसी समय सूर्य दक्षिण से उत्तर में प्रवेश करते हैं ।
रंगयाली पिछोड़ा
उत्तरांचल में विवाह के आलावा अन्य शुभावसरों पर पहने जाने वाली चुनरी को रंगयाली पिछोड़ा कहते है। यह संयुक्त रूप से लाल तथा पीले रंग का होता है। ऐपण की तरह इसमें भी शंख , चक्र , स्वस्तिक , घंटा , बेल-पत्ती, फूल, आदि शुभ चिन्हों का प्रयोग होता है। पहले लोग घर पर ही कपड़ा रंग कर पिछोड़ा तैयार करते थे । प्रचलित होने के कारन अब रंगयाली पिछोड़ा रेडीमेड भी आने लगे हैं। इन्हे और सुंदर बनाने के लिए इन पर लेस , गोटा, सितारे आदि लगाए जाते हैं।
नथ
उत्तरांचल के आभूषन भी अपनी पहचान बनाने में कम नही हैं। उत्तरांचल की नथ (नाक में पहने जाने वाला गहना )अपने बड़े आकार के कारण प्रसिद्द है। यह आकार में बड़े गोलाकार की होती है और इसके ऊपर मोर आकृति आदि डिजायन बनाए जाते हैं। इन डिजायनों को बनाने के लिए नगों तथा मीनाकारी का प्रयोग जाता है।

यूँ तो उत्तरांचल की सांस्कृतिक रूप को चंद लाइनों में नही समेटा जा सकता । फिर भी इन मुख्य परम्परों से हमें उत्तरांचल के सांस्कृतिक पहलुओं की एक झलक देखने को मिलती है। अगर यह झलक हमारी परम्पराओं और संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रेरित करती है तो मेरा यह कदम सही है।








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