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रविवार, 4 सितंबर 2011

शिक्षक

मिटा देता है अज्ञान के अँधेरे
जला देता है ज्ञान के दीपक
खुद जलता है बनके शम्मा
तभी कहलाता है वो शिक्षक

जैसे एक मूर्तिकार सँवारता है मूरत
शिक्षक देश का भविष्य उकेरता है
ढाल के ज्ञान के साँचे में सबको
नित नई-नई ऊँचाइयाँ देता है

प्रथम सीढ़ी बनकर देता है
कल्पनाओं को सच्ची उड़ान
लड़खड़ाते हुए नन्हे कदमों में
डालता है आत्मविश्वास की जान

खुश होता है बनके नींव का पत्थर
खड़ी करता है चरित्र की उत्तम इमारत
पैदा करता है नर में कृष्ण और राम को
जो इतिहास रच बढ़ाते हैं गुरु के नाम को

शनिवार, 3 सितंबर 2011

अक्सर जिन्दगी में ऐसे मोड़ आते हैं

अक्सर जिन्दगी में ऐसे मोड़ आते हैं
मंजिल के निशाँ रेत से फिसल जाते हैं
लेकिन यह भी सच है कि ये धोखे
हमको आगे बढ़ना भी सिखाते हैं
अक्सर जिन्दगी---------------------------

१- एक सपना पालो तुम आँखों में
जल उठेगा उम्मीद का दीया
हों रास्ते कितने ही कठिन क्यों न
कम ना करना कभी होंसला
अक्सर जिन्दगी में ऐसे मोड़ आते हैं
मंजिल के निशाँ रेत से फिसल जाते हैं

२- जो न बैठे कभी हार के हरदम बढ़ता रहे
अँधेरों की देहरी के पार उसे ही रोशनी मिले
तूफानों से लड़कर जो रास्ता बनाता है
लक्ष्य अपना वो ही हासिल कर पाता है
अक्सर जिन्दगी में ऐसे मोड़ आते हैं
मंजिल के निशाँ रेत से फिसल जाते हैं

जिन्दगी का कारवाँ रुका सा लगे

जिन्दगी का कारवाँ रुका सा लगे
सब कुछ अब यहाँ थमा सा लगे
छाई है इक उदासी सीने में इक घुटन है
इक-इक पल अब यहाँ बरस सा लगे
जिन्दगी का कारवाँ रुका सा लगे

१- ऐसा नहीं कि हमने बाजी नहीं लगाई
कोशिश बहुत करी पर हरदम ही मात खाई
थक गए अब बहुत हम कदम लड़खड़ा गए
जिन्दगी का कारवाँ रुका सा लगे

२- उम्मीद की किरन हम ढूँढते हैं अभी भी
मंजिल की ओर उठकर बढ़ते हैं अभी भी
पर आशाओं का दीया बुझता सा लगे
जिन्दगी का कारवाँ रुका सा लगे

शनिवार, 20 अगस्त 2011

करो आवाज़ बुलंद

जब तलक आवाज बुलंद न की जाएगी
तब तलक कहाँ कानों में जूँ रेंग पाएगी
इसलिए उठो और ऐसी हुंकार भरो
इससे ही सत्ता हिल पायेगी

जल उठी हैं चिंगारियाँ



जल उठी हैं चिंगारियाँ
शोलों को हवा देते रहना
बहुत रह चुके हम नींद में
सोयों को अब जगाते रहना



जो सोवत है सो खोवत है
जो जागत है वो पावत है
यह बात कोई झूठी नहीं
एकदम सच्ची कहावत है



इतना खो चुके हैं कि अब
खोने को कुछ बाकी नहीं
इतना रो चुके हैं कि अब
आँखों में कोई आँसू ही नहीं

यह लौ लगी है मुश्किल से
इस लौ को अब जलाके रखना

जल उठी हैं चिंगारियाँ
शोलों को हवा देते रहना
बहुत रह चुके हम नींद में
सोयों को अब जगाते रहना



क्या सोचा था क्या पाया हमने
आजादी का मोल भुलाया हमने
भ्रष्‍टाचार के रावण को
खुद ही तो खून पिलाया हमने


बहुत हो चुका अब और नहीं
हम खुदगर्ज़ थे कमजोर नहीं
जो जाग उठे हैं तंद्रा से
तो इंकलाब की भोर हुई

अब डटे रहो, न थक जाना
सबका होंसला बनाके रखना



जल उठी हैं चिंगारियाँ
शोलों को हवा देते रहना
बहुत रह चुके हम नींद में
सोयों को अब जगाते रहना

जन-जन की है यही पुकार खत्म करो यह भ्रष्‍टाचार


बुधवार, 17 अगस्त 2011

देशभक्‍ति का मर्म

आज की चर्चा का, मुख्य विषय है
क्या ’देशभक्‍ति’ की, किसी को ख़बर है
कुछ बच्चे कहते हैं, शायद ये एलियन हैं
छ्ब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त, इनके मैन दिन हैं

मैने कहा, बच्चों, "क्या तुम इनका अर्थ समझते हो ?
क्यों बन गए ये दोनों एलियन? इसका मर्म कह सकते हो?"
बच्चे बोले, "आंटी ! क्या ओल्ड लोगों की बातें करती हो?
स्पाइडर मैन, सुपरमैन के बारे में, क्यों नहीं पूछती हो?"
मैंने कहा, अरे ! "ये तो टी.वी. के कलाकार हैं"
तब बच्चे बोले ,"देशभक्‍ति कौन से सुपरस्टार हैं"
हमें तो ऐसे लोग ही ध्यान में रहते हैं
जो अक्सर लाइम लाइट में रहते हैं
अभी इनको,(क्या नाम बोला) हाँ-हाँ,
देशभक्‍ति को, कहाँ से याद करेगा
आजकल इनका ज़िक्र, कहीं नहीं मिलेगा
अब आपको पता है, तो खुद ही बता दीजिए
और इस कन्फ्यूजन को रफ़ा-दफ़ा कीजिए

मुझे लगा, यह अच्छा मौका है, सोई भावनाएँ जगाने का
इन बच्चों को, देशभक्‍ति से, रुबरू कराने का
मैने कहा, बच्चों! "देशभक्‍ति एक शब्द अथवा नाम नहीं है
ये वो भावनाएँ हैं जो आजकल आम नहीं है"
फिर भी मैं, कोशिश करती हूँ, तुम्हें समझाने की
सोई भावनाओं को, फिर से जगाने की
सुनो," अंग्रेजी’ में जो मतलब ’पैट्रीओज़्म’ का होता है
उसी को हिन्दीभाषी ’देशभक्‍ति’ समझता है
कभी ’आजाद’ और भगतसिंह ने, इनको जाना था
सुभाष चंद्र बोस भी, इनका दीवाना था

देशभक्‍ति के भाव ने उनमें इतनी शक्‍ति भर दी
इन सब ने मिलकर अंग्रेजों की छुट्टी कर दी
सारे देशवासियों के दिल में जब देशभक्‍ति समाई थी
तभी तो देश में अंग्रेजों की शामत आई थी
छोड़कर भारत की ज़मीं उन्हें जाना पड़ा था
देशभक्‍ति की ताकत से ही उनका सिर झुका था

समझे बच्चों ! पूरा देश हमारा घर तथा परिवार है
यही भावना देशभक्‍ति का आधार है
गर इतनी सी बात तुम समझ जाओगे
खुद को देशभक्‍ति से ओत-प्रोत पाओगे

रविवार, 14 अगस्त 2011

विचारणीय तथ्य

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से
गीता में कहा,
सुन पार्थ! तुझको दूँ मैं
एक सत्य बता
यह शरीर तो जन्म से ही नश्वर है
आत्मा ही है जो यहाँ शाश्‍वत है
नित नए रूप (शरीर) यह धारण करती है
कोटि अस्त्रों-शस्त्रों से भी यह नहीं मरती है
न सुखा सकी इसको हवा
और पानी भी न सका भिगा
आग तो इससे तौबा करती है
यह आग से भी न जलती है
गीता में कहा गया सच
आज भी अटल है
कलयुग में भी आत्माओं का
अदल-बदल है
लाचारी-भुखमरी की आत्माएँ
गरीबों-भिखमंगों के शरीरों में समाती हैं
रिश्वत-भ्रष्टाचार की आत्माएँ
नेताओं में डेरा जमाती हैं
इन आत्माओं की कभी मृत्यु नहीं होती
ये तबादला पसंद करती हैं
पाँच साल में बदलने वाली सरकार की तरह
अपना चोला बदल सकती हैं
लाचारी, भुखमरी रिश्वतखोरी और
भ्रष्टाचार की आत्माएँ बड़ी देशभक्त हैं
भारतभूमि से तो इन्हें जन्मजात प्रेम है
कभी नेता. इंजीनियर, डॉक्टर
तो कभी बेरोजगार और बीमार
इनका चोला तो यह बदलेंगी
लेकिन ये अमर आत्माएँ
भारत का दामन न छोड़ेंगी
यह एक कटु सत्य है
किंतु
सबके लिए विचारणीय तथ्य है

हम कौन थे ? क्या हो गए ? और क्या होंगे अभी ?............... आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी

’आजादी’ क्या सिर्फ एक शब्द है या फिर इस शब्द में बहुत गहराई है ? कुछ ऐसे ही सवाल अक्सर उमड़ते रहते हैं । लेकिन इसका उत्तर आज में नहीं, उस अतीत के बीज में है जो आजादी के पहले की पृष्‍ठभूमि की गोद में छिपा है । देश में राजा-महाराजाओं का शासनकाल था । भारत भूमि धन-धान्य तथा प्राकृतिक संपदाओं से पूर्ण थी । भारत वर्ष को सोने की चिड़िया कहा जाता था । ऋषि-मुनियों की भूमि, सत्य-अहिंसा जैसे मानव मूल्यों की जननी भारतमाता हिमालय का मुकुट धारण किए समुद्र सिंहासन पर विराजित थी । हर तरफ यही स्वरलहरी गूँजती थी-
१-जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया

देश में हर तरफ लहलहाती फसलें ऐसी प्रतीत होती थीं जैसे भारत की धरती सोना उगलती है । चहुँ और सुख-शांति का वातावरण था । प्यार की गंगा बहती थी । हमारी देश भूमि ने केवल सोना ही नहीं उगला अनेख रत्नों को भी जन्म दिया है । इन रत्नों में गांधी, सुभाष, भगत सिंह, आजाद आदि का नाम अविस्मरणीय है । इसीलिए आज भी हमारा दिल गा उठता है-
२- मेरे देश की धरती सोना उगले-उगले हीरे मोती

जब हमारी भारतभूमि सुख और अमन की पैदावार कर रही थी । तभी देश में फिरंगियों ने अपने पैर जमाने शुरु किए और देखते ही देखते ये फिरंगी पूरे भारत पर छा गये । उन्होंने चैन और अमन की धरती पर फूट और हिंसा की खेती शुरु कर दी । भाई-भाई को आपस में लड़वा दिया । जहाँ प्यार की गंगा बहती थी वहाँ अब खून की नदियाँ बहने लगीं थी । तब देश में उमड़ा इंकलाब का सैलाब । यह सैलाब ऐसा था कि भारतवासियों का रोम-रोम देशभक्‍ति की आग से जल उठा । जनता अपने प्राणों की बलि देकर भी भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए तड़प उठी। हर भारत वासी यही कहता----
३-ए वतन, ए वतन मुझको तेरी कसम

देश का बच्चा-बच्चा आजादी के हवन कुंड में अपनी आहुति देने के लिए तैयार था। यही नहीं भगत सिंह जैसे आजादी के परवाने तो आजादी को अपनी दुल्हन कहते थे । वो कहते थे कि -"माँ तू मेरा बसंती चोला रंग दे मैं आजादी की दुल्हन को ब्याह कर लाऊँगा । जब भगतसिंह., सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई तब भी उनके मुख से यही शब्द निकले थे-
४-मेरा रंग दे बसंती चोला

हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों तथा आजादी के परवानों ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए तब जाकर हमें यह आजादी नसीब हुई । उन्होंने तो आजाद भारत की झलक न देखी पर हमें वो आजादी की साँसे दे गए । एक उम्मीद और एक आस लिए जाते-जाते सिर्फ यही कह गये " कर चले हम फिदा जान और तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों"
५-कर चले हम फिदा जान

हमारे देश के वीर जवानों ने हमेशा अपना कर्तव्य निभाया है और आगे भी निभाते रहेंगे । चाहे वह स्वतंत्रता संग्राम हो या फिर कारगिल युद्ध वे कभी भी अपने फर्ज से नहीं डिगे । उनके मन में हमेशा यही डर था कि कहीं आने वाले कल में कोई उन्हें इल्जाम न दे ।
६-देखो वीर जवानों अपने खून पे ये इल्जाम न आये

खैर हमारे वीर जवानों और शहीदों ने तो अपना फर्ज़ बखूबी निभाया है। लेकिन प्रश्न तो यह उठता है कि हमने क्या किया ? आजादी के चौंसठ सालों में हम क्या से क्या हो गए । क्या हमारी आजादी इतनी सस्ती है ? क्या हमारे वीर-जवानों का खून इतना सस्ता है ? कौन है जो आगे आए और कहे "नहीं, हम अपनी आजादी को ऐसे ही मिटा नहीं सकते ।
७-अपनी आजादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं

दोस्तों आज जो देश में हालात हैं, वह फिर से उन्हीं पुराने दिनों की याद दिलाते हैं। आपसी मतभेद, आतंकवाद, जातिवाद आदि अनेक दानव भारतभूमि को फिर से निगलने को तैयार खड़े हैं । यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब एक बार हमारा देश फिर से विदेशी ताकतों का गुलाम बन जाएगा और फिर से जिन्दगी मौत के समान हो जाएगी । इसलिए सोचो और समझो-
८-ज़िन्दगी मौत न बन जाए सँभालों यारो

कहा गया है "गर तुझे तेरी गलती का एहसास है, फिर तेरे सुधरने की आस है" यदि हम सब भी अपनी गलतियों का एहसास कर स्वयं को सुधारेंगे तो एक अच्छे भविष्य की कल्पना कर सकते हैं । यदि हमें देश और आजादी का महत्व जानना है तो उन शहीदों की कुर्बानियों को याद करो जिन्होंने सरहद पर जान गँवाई और हमें आजाद भारत दे गए-
९-ए मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी

यदि हम सब सच्चे हिन्दुस्तानी हैं तो आइए एक वादा करिए और कसम उठाइए कि "आज से जो भी करेंगे देश के लिए करेंगे चाहे जान भी चले जाए पीछे नहीं हटेंगे"-
९-हर करम अपना करेंगे, ए वतन तेरे लिए


शनिवार, 13 अगस्त 2011

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

आँखें हो जाती है नम आज भी
जब बजती है यह धुन
"अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो"
और दीमक की तरह चाटने लगता है
एक बार फिर शर्मिन्दगी का घुन

जब आजादी के परवानों ने
दी थी अपनी जानों की आहुतियाँ
कही विश्वास था उनके हृदय में
अब सँभालेंगी वतन को नव जवानियाँ

हाँ बहुत सँभाल लिया है हमने वतन को
तिजौरियों में सुरक्षित किया है धन को
अमीरों को और भी अमीर बना दिया है
गरीबों को मौत की कगार पर खड़ा किया है

चौसठ सालों में हजारों योजनाएँ चलाईं हैं
इसी के जरिए हमारी जेबें भर पाई हैं
संस्कृति की रक्षा के नाम पर अनेक जुलूस निकाले
वैलेंनटाइन डे पर कईयों के मुँह किये काले

यही नही हमने स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर
कई पार्क तथा मार्ग बनवाए हैं
जरूरत पड़ने पर उनके जन्म-मरण दिन पर
अक्सर मेले लगवाए हैं

बहुत कुछ किया है हमने फिर भी
क्या है जो धिक्कारता है
कचोटता है आत्मा को
और अंदर से पुकारता है

शायद यह है हमारा अंतर्मन
जब भी सुनता है यह धुन
"अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो"
हर बार जगा देता है शर्मिंदगी का घुन
कहता है इस बार तो अपने दिल की सुन

बुधवार, 10 अगस्त 2011

रक्षाबंधन का धागा

यह धागा बड़ा ही करामाती है
लड़कों की जाति इससे बहुत घबराती है
कहीं बाँध न दे कोई इसे कलाई में
इसलिए रात भर नींद न आए रज़ाई में

ख्वाब में भी कह न दे, भाई कोई
आँखें बंद करने से अक्सर डर जाते हैं
हसीन लड़की के हाथ में राखी देख
’गधे के सिर से सींग’ के जैसे गायब हो जाते हैं

कभी-कभी इनके दिमाग में यह प्रश्‍न भी उठता है
यह रक्षाबंधन का त्योहार आंखिर क्यों होता है ?
कितना कठिन है दूसरे की बहन से राखी बँधवाना
इससे ज्यादा तो सरल है , ज़हर पीकर मर जाना

लेकिन इस धागे का मोल है जिसने जाना
उसने ही सीखा सच्चा रिश्ता निभाना
यह धागा केवल भाई-बहन तक ही नहीं सीमित है
इस धागे की सीमा रेखा तो बहुत ही विस्तृत है

यह धागा, एक वचन है - रक्षा का
कभी नर तो कभी नारी के हिस्से का
समझो, इस धागे के पीछे छुपी भावनाओं को
और समेट लो कलाई में बँधी शुभकामनाओं को

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

रक्षाबंधन-एक रिश्ता धागे का

बचपन में कभी माँ ने समझाया था
कि यह केवल एक धागा नहीं है,
एक विश्‍वास है, जो उम्र के साथ गहरा होता जाता है
हमारा इतिहास भी तो यही बताता है
तब लगता था कि क्या कभी कोई एक रिश्ता
एक धागे का मोहताज हो सकता है
क्या एक पतला सा तार
किसी रिश्ते का आधार हो सकता है
उम्र के साथ जब हुई रिश्तों की समझ
तब समझ में आया इस धागे का महत्व
क्या गज़ब की शक्‍ति है इस धागे में
रानी कर्मावती ने बाँधा हुमायुँ को रक्षा के वादे में
कभी यह धागा कृष्ण की कलाई पर बँधा था
द्रोपदी का चीर हरण, इसी वचन से बचा था
जब इन्द्र ने पत्नी से यह रक्षा कवच बँधवाया था
तभी तो देवों ने मिल कर दानवों को हराया था
युग बदले पर न बदली कभी इस धागे की कहानी
अपनों के साथ परायों ने भी, इसकी कीमत जानी
धर्म और जाति से ऊपर है, यह प्रेम का धागा
सरहदों के पार से भी, निभाता आया अपना वादा
यह तो है एक मन से मन का संगम
एक नर का नारी से रक्षा का बंधन



रविवार, 7 अगस्त 2011

ऐ दोस्त


कब तुमने मेरा हाथ थामा
पता ही न चला
कब तुम मेरे अज़ीज बन गये
पता ही न चला

आहिस्ता से रगों में बहते लहु की तरह
कब धड़कनों में उतर गये
पता ही न चला

बचपन की गलियों से गुजरते हुए
यौवन की दहलीज़ तक
कब रिश्ते गहराते चले गए
पता ही न चला

आज जब दूर हो तो
इस गहराई की हुई है भनक
हर रिश्ते की खुशबू से
आती है बस तेरी ही महक

कब तेरा दामन छूटा
पता ही न चला
कब तू मुझसे रूठा
पता ही न चला

आ..एक बार आजा,
देती हैं सदाएँ, मेरी धड़कनें तुझको
अधूरी हूँ तेरे बिना,
आज यह एहसास है मुझको

भूल कर सब, ढूँढें एक मौका नया
आ फिर शुरु करें दोस्ती का सिलसिला

ऐ यार सुन

ऐ यार सुन यारी तेरी
हमें आज भी बहुत प्यारी है
आँखें हो बंद या हो खुलीं
तस्वीर इनमें तुम्हारी है

हम हैं कहाँ, तुम हो कहाँ
संग मेरे यादों का कारवाँ
ऐसा लगे तुम हो यहीं
जैसे चलें संग साँसे मेरी
आँखें हैं मेरी पर इनमें रोशनी तुम्हारी है
ए यार सुन यारी तेरी
हमें आज भी बहुत प्यारी है

भीड़ में हो या अकेले में
गलियों में हों या मेले में
आज भी जब कोई आवाज़ आती है
ए दोस्त तेरी याद चली आती है
दिल है मेरा पर धड़कन इसमें तुम्हारी है
ए यार सुन यारी तेरी
हमें आज भी बहुत प्यारी है


शनिवार, 23 जुलाई 2011

देशभक्‍ति- एक दबी भावना

जल सकती है ये आग कभी भी
राख के नीचे है, चिंगारी दबी सी
जरूरत है, एक हवा के, झोंके की
जो सींच दे जड़, आग के शोले की

फिर देखो, इस कदर उठेगा धुआँ
इन लपटों से, जल पड़ेगा, रुआँ-रुआँ
यह सिर्फ तूफान के पहले की, है शान्ति
फिर ये लहरें ही, बन जाएँगी, क्रान्ति

जो धीरे-धीरे साहिल पर दस्तक देती हैं
कर दे अनसुनी, तो उसको चपेट में, ले लेती हैं
इसी तरह, यह भावनाओं का, ज्वारभाटा है
जिन्हें तलाश है, उस चंद्र की, जो इन्हें जगाता है

एक बार, होने दो मन का मन से संगम
फिर देखना इसकी शक्‍ति का प्रदर्शन
प्रलय होगी, नष्‍ट होंगे, बुराई के दानव
होगा देश में एक भारी परिवर्तन

बुधवार, 20 जुलाई 2011

बड़ों की सीख

माँ कहती है पढो-लिखो
तुम बन जाओ होशियार
काम करो नित अच्छे-अच्छे
दो जीवन को आधार

पापा भी मुझको अक्सर
यही बात समझाते हैं
बेटा मेहनत से ही हम
अपना भाग्य बनाते हैं

दादा कहते सुन लो राजू
बात हमारी ध्यान से
सदा बड़ों का आदर करना
जीना सीना तान के

दीदी मेरी बड़ी सयानी
कहती है बारम्बार
प्यारे भैया नासमझी से
न खो देना ये दुलार

मैंने भी है मन में ठानी
तोड़ूँगा ना विश्‍वास
सभी बड़ों का कहना मानूँ
बनूँगा सबका खास

जिन्दगी

कभी यूँ भी करवट लेती है जिंदगी
पैरों से ज़मी खींच लेती है जिंदगी
जो अक्सर गुम रहते थे खयालों में उन्हें
हकीकत से रुबरू कर देती है जिंदगी
न होना कभी हकीकत से परे
एक नया सबक दे देती है जिंदगी
ये सिलसिला तो उम्र भर का है
हर पल इम्तहा लेती है जिन्दगी
कोइ कितना ही कोसे जिंदगी को यारों
खुशियों के पल भी तो देती है जिंदगी

गुरुवार, 12 मई 2011

जैसा कर्म वैसा फल

मीकू बंदर बहुत ही शैतान बंदर था। पूरे दिन जंगल में एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाता फिरता । झूठ बोलना मीकू का शौक था और वह इतनी सफाई से झूठ बोलता था कि लोग उसकी बातों पर विश्‍वास कर लेते थे ।मीकू की माँ ने उसे कितनी बार समझाया, "मीकू !बेटा सुधर जाओ, झूठ बोलना अच्छी बात नहीं है। एक दिन अपनी इस आदत के कारण तुम जरूर किसी मुसीबत में फँस जाओगे।"

पर मीकू पर इन बातों का क्या असर होता । वह तो अपनी दुनिया में ही मस्त था । दिन-प्रतिदिन उसकी लापरवाहियाँ भी बढती जा रही थीं । आजकल वह पढ़ाई-लिखाई भी ढंग से नहीं करता था। मीकू के दो दोस्त थे - चिंकू खरगोश और टीपू हिरन । चिंकू और टीपू ने भी मीकू से कहा , "देखो मीकू अगर तुम्हारा यही हाल रहा तो हम दोनों भी तुम्हारी सहायता नहीं कर पाएँगे।



एक दिन जंगल में कुछ शिकारी आए । वे सर्कस के लिए जानवर पकड़ने आए थे। जंगल में कुछ जानवर ऐसे भी थे जिनको मीकू ने बहुत परेशान किया था। वे लोग मीकू को सबक सिखाना चाहते थे । लोमड़ी लीला तो कब से मौका ढूँढ रही थी। जब उसे पता चला कि जंगल में शिकारी आए हैं तो उसने मीकू को उनके जाल में फँसाने की सोची।

लीला को पता था कि मीकू को छलाँग लगाने तथा करतब दिखाने का बड़ा शौक है। फिर क्या उसने मीकू की इसी कमजोरी का फायदा उठाने की सोची। लीला जल्दी से मीकू के पास पहुँची और बोली, " मीकू जंगल में कुछ लोग अच्छी कलाबाज़ी करने वाले जानवरों की खोज करउन्हें ईनाम दे रहे हैं। उसके बाद वे अखबार में उनका फोटो और इंटरव्यू छापेंगे। मैं तो ज्यादा उछल-कूद कर नहीं पाती। मुझे तुम्हारा ध्यान आया तो तुम्हें बताने चली आई। तुम नहीं गए वहाँ ? अरे मीकू ! तुम तो सारे जंगल में प्रसिद्ध हो जाओगे। तुम्हें बताना मेरा फर्ज था। आगे तुम्हारी मर्जी,।"

मीकू बोला, "अरे मौसी ! रुको तो। ज़रा ये तो बताती जाओ जंगल में ये सब कहाँ पर हो रहा है ?" लीला लोमड़ी मन ही मन मुस्काई और बोली, "बेटा वो बिल्लू भेड़िये के घर के पास से जो रास्ता जाता है ना वहीं उन्होंने अपना डेरा जमाया है। लेकिन मीकू एक बात का ध्यान रखना जब तुम वहाँ जाओगे तो तुम उनके डेरे के पास जाकर कुछ करतब दिखाकर लौट आना वहाँ पर रुकना नहीं। फिर देखना वो तुम्हें कैसे बुलाते हैं।" इतना कहकर लीला चली गई और अपनी चाल के सफल होने का इंतजार करने लगी।

उधर मीकू के पैर तो ज़मीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। आज वो पूरे रास्ते कलाबाज़ी का अभ्यास करता हुआ ही स्कूल पहुँचा। चिंकू और टीपू ने देखा कि मीकू बहुत खुश दिख रहा है। चिंकू बोला, "क्या बात है मीकू ! बहुत खुश दिख रहे हो ?" टीपू ने चुटकी ली और कहा, "जरूर किसी को परेशान किया होगा इसने, तभी सोच-सोच कर खुश हो रहा है।" मीकू को गुस्सा आ गया। वह पैर पटकता हुआ बोला, "बोल लो-बोल लो। जितना हँसना है हँस लो। कल जब मेरा नाम अखबार में आएगा और मैं जंगल में प्रसिद्ध हो जाऊँगा तब देखूँगा तुम दोनों को।"

चिंकू और टीपू को माजरा समझ नहीं आया। वह बोले, "गुस्सा क्यों होता है मीकू, हम तो मजाक कर रहे थे। कुछ हमें भी तो बताओ।" तब मीकू उनको ईनाम वाली बात बताता है। दोनों सुनकर हैरान रह जाते हैं और कहते हैं, "हमें तो दाल में काला नज़र आता है। इस बारे में तो किसी को कुछ भी नहीं पता।" चिंकू और टीपू मीकू को वहाँ जाने से मना करते हैं पर वह उनको डाँटकर चला जाता है।

अगले दिन मीकू माँ से सैर पर जाने का बहाना करके तैयार होकर घर से निकलता है। और सीधा लीला लोमड़ी की बताई जगह पर पहुँच जाता है। वहाँ उसे कुछ टैंट दिखाई देते हैं। कुछ लोग बाहर भी बैठे थे। मीकू ने आव देखा न ताव और करतब दिखाना शुरू कर दिया। जब सर्कस के लोगों की नजर उस पर पड़ी तो वो भौंचक्के रह गए। वो
आपस में बात करने लगे, "अरे ! अगर ऐसा बंदर हमारे सर्कस में आ जाए तो हमारी तो चाँदी ही चाँदी हो जाएगी।"उनमें से एक ने अपने दूसरे साथी को इशारा किया। उधर मीकू करतब दिखाने में मस्त था। तभी एक जाल तेजी से उड़ता हुआ मीकू के ऊपर आकर गिरा और वह जाल में फँस गया। मीकू को सँभलने का मौका भी न मिला। तभी आवाज़ सुनाई पड़ी, "शाबाश ! बहुत अच्छे।" पीछे से सर्कस का मालिक निकलकर आगे आया। "तुम सब ने तो कमाल कर दिया। अब हमें इस जंगल से निकलना चाहिए। अगर किसी को ख़बर लग गई तो हम सब जेल में होंगे।" सबने अपना समान बाँधा और मीकू तथा दूसरे जानवरों को गाड़ी में डालकर वहाँ से चल दिए। मीकू मन में
सोच रहा था, "काश ! मैंने माँ का कहना माना होता।" लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

लीला लोमड़ी पेड़ के पीछे से सब तमाशा देख रही थी। आज उसने अपना बदला ले लिया था। मीकू को भी अपनी करनी का फल मिल गया। उसने झूठ बोल-बोलकर जंगल में बहुत लोगों को दुखी कर रखा था।

सोमवार, 9 मई 2011

हिसाब देना मुश्किल है

लाखों-करोड़ों दुआओं का
हाथों से लेती बलाओं का
हिसाब देना मुश्किल है
झूला झुलाती बाँहों का
ममता के आँचल की छाँव का
हिसाब देना मुश्किल है
निश्चल समर्पित प्यार का
अनगिनत उपकार का
हिसाब देना मुश्किल है
ममता का पलड़ा है भारी
देवों की भी पूजनीय नारी
उस करुणामयी माँ का
हिसाब देना मुश्किल है