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शनिवार, 13 अगस्त 2011

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

आँखें हो जाती है नम आज भी
जब बजती है यह धुन
"अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो"
और दीमक की तरह चाटने लगता है
एक बार फिर शर्मिन्दगी का घुन

जब आजादी के परवानों ने
दी थी अपनी जानों की आहुतियाँ
कही विश्वास था उनके हृदय में
अब सँभालेंगी वतन को नव जवानियाँ

हाँ बहुत सँभाल लिया है हमने वतन को
तिजौरियों में सुरक्षित किया है धन को
अमीरों को और भी अमीर बना दिया है
गरीबों को मौत की कगार पर खड़ा किया है

चौसठ सालों में हजारों योजनाएँ चलाईं हैं
इसी के जरिए हमारी जेबें भर पाई हैं
संस्कृति की रक्षा के नाम पर अनेक जुलूस निकाले
वैलेंनटाइन डे पर कईयों के मुँह किये काले

यही नही हमने स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर
कई पार्क तथा मार्ग बनवाए हैं
जरूरत पड़ने पर उनके जन्म-मरण दिन पर
अक्सर मेले लगवाए हैं

बहुत कुछ किया है हमने फिर भी
क्या है जो धिक्कारता है
कचोटता है आत्मा को
और अंदर से पुकारता है

शायद यह है हमारा अंतर्मन
जब भी सुनता है यह धुन
"अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो"
हर बार जगा देता है शर्मिंदगी का घुन
कहता है इस बार तो अपने दिल की सुन

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