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शनिवार, 26 जनवरी 2013

गणतंत्र है इक ताश का पत्‍ता


तंत्र मंत्र के चक्‍कर से
अभी तक हम न निकल पाए
देखो हमारे मदारी नेता
घूमते हैं गणतंत्र का झुनझुना बजाए
जो स्वयं न समझ पाए कभी
इस तंत्र का सही मतलब
वही आज सरेआम फिरते हैं
वतन परस्ती का तमगा लगाए
तो सोच लो ए आम जनता
ये गणतंत्र है इक ताश का पत्‍ता
नेता बनकर बैठा जुआरी
इस देश की बाज़ी लगाए

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

क्या मैं स्वतंत्र हूँ ?




है प्रश्न बहुत गंभीर
कर देता है मुझे अधीर
देता है दिन रात दस्तक
पूछता है-क्या मैं स्वतंत्र हूँ ?
कक्षा में पढ़ाए गए थे जब गणतंत्र के विचार
तब शिक्षक ने बताए थे हमारे मौलिक अधिकार
इस गणतंत्र में सभी स्वतंत्र हैं कुछ भी कहने के लिए
सहमति या विरोध का मत देने के लिए
लेकिन आज जब भी कोई आवाज़ उठाता है
सबसे पहले उसका मौलिक अधिकार छीना जाता है
फिर क्यों न उठे यह प्रश्न- क्या मैं स्वतंत्र हूँ ?
गणतंत्र है मेरे लिए फिर भी मैं क्यूँ परतंत्र हूँ।


शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

क्या है यह योग?



तन और मन का आपसी संतुलन
या फिर आत्मा का परमात्मा से मिलन
हैं संदेह और प्रश्न बहुत से
कुछ दूसरों से कुछ स्वयं से
जब पढ़ा, समझा तो जाना
यह तो है सदियों पुराना
हर युग से, हर परम्परा से इसका नाता है
हिन्दी में योग तो अंग्रेजी में योगा कहलाता है
जिसको जिस रूप में भी भा जाए
वह इसे अपने जीवन में अपनाए
तन और मन की शांति के लिए
एक नए युग की क्रांति के लिए
करो अपना जीवन योग को समर्पित
तन और मन दोनों ही होंगे पवित्र
तो उठ खड़े हो, आलस्य का त्याग करो
अपनाकर योग सभी रोगों का नाश करो