हर बार मंज़िल मिलना ज़रूरी नहीं, आगे बढ़ते रहना ज़रूरी है

 


ज़िंदगी हमेशा हमारी इच्छाओं केअनुसार नहीं चलती। कभी रास्ते आसान होते हैं, तो कभी कदम-कदम पर मुश्किलें हमारा इंतज़ार करती हैं। कभी मेहनत का परिणाम तुरंत मिल जाता है, तो कभी लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि हम प्रयास करना छोड़ दें? बिल्कुल नहीं!

हम अक्सर अपनी सफलता को दूसरों की उपलब्धियों से मापने लगते हैं। कोई हमसे आगे निकल गया, किसी को हमसे पहले पहचान मिल गई, किसी का सपना हमसे पहले पूरा हो गया। अनजाने में हम अपनी यात्रा की तुलना दूसरों की मंज़िल से करने लगते हैं। यहीं से मन में निराशा जन्म लेने लगती है।

हम यह भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग हैं, उसकी क्षमताएँ अलग हैं और उसकी यात्रा भी अलग है। किसी के लिए जो रास्ता आसान है, वही दूसरे के लिए संघर्षपूर्ण हो सकता है।

जीवन में सबसे बड़ी चुनौती दूसरों से आगे निकलना नहीं, बल्कि अपने भीतर के डर, संदेह और निराशा से आगे निकलना है।

कई बार ऐसा भी होता है कि हम पूरी ईमानदारी से मेहनत करते हैं, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता। हमारी प्रतिभा को पहचान नहीं मिलती, हमारे विचारों को महत्व नहीं दिया जाता और हमारे प्रयास अनदेखे रह जाते हैं। ऐसे समय में मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतनी मेहनत किसलिए?

लेकिन शायद हमें अपनी मेहनत का मूल्यांकन केवल परिणामों के आधार पर नहीं करना चाहिए। हर प्रयास हमें कुछ सिखाता है। हर असफलता हमें अपनी कमियों को पहचानने का अवसर देती है और हर संघर्ष हमारे भीतर एक नई क्षमता विकसित करता है।

याद रखिए, पेड़ पर लगे फल को देखकर उसकी प्रशंसा करना आसान है, लेकिन उस बीज के संघर्ष को समझना कठिन है, जिसने मिट्टी के अँधेरे में रहकर जड़ें विकसित की हैं।

इसलिए अपने जीवन की गति को लेकर परेशान मत होइए। यदि आज आपको वह सब नहीं मिला, जिसकी आपने कल्पना की थी, तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपकी यात्रा व्यर्थ है।

कभी-कभी मंज़िल तक पहुँचने से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है उस यात्रा में स्वयं को पहचानना।

अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों का आनंद लीजिए। अपने प्रयासों पर विश्वास रखिए। दूसरों की सफलता से प्रेरणा लीजिए, लेकिन अपनी योग्यता पर संदेह मत कीजिए।

क्योंकि जीवन कोई प्रतियोगिता नहीं, जिसमें सभी को एक ही समय पर एक ही स्थान पर पहुँचना हो।

बस चलते रहिए...

हो सकता है आज आपका कदम छोटा हो, लेकिन यही छोटा कदम कल किसी बड़ी मंज़िल की नींव बने।

अंततः सफलता केवल वहाँ पहुँचने का नाम नहीं है, जहाँ हम पहुँचना चाहते हैं। सफलता तो उस विश्वास को बनाए रखने में भी है, जो हमें हर बार गिरकर फिर से उठने की शक्ति देता है।

क्योंकि मंज़िल मिलने से पहले भी एक खूबसूरत उपलब्धि होती है और वह है—हार न मानने का साहस!

— दीपाली 'दिशा'

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

तुलसीदास - समन्वयवादी, समाज सुधारक और दार्शनिक विचारधारा के कवि

हम हीरे लुटाकर , कोयले बचा रहे हैं।

एक रिश्ता दोस्ती का